शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थाईलैंड में बिम्सटेक सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद श्रीलंका पहुंचे। यह उनकी 2019 के बाद पहली श्रीलंका यात्रा है और अनुरा कुमारा दिसानायके के राष्ट्रपति बनने के बाद पहला आधिकारिक दौरा है। इस यात्रा के दौरान भारत और श्रीलंका ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिसे दोनों देशों के संबंधों में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
इससे पहले श्रीलंका के राष्ट्रपति दिसानायके तीन महीने पहले भारत आए थे, जहां दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग पर सहमति के संकेत मिले थे। पीएम मोदी की इस यात्रा में उस रक्षा समझौते पर अंतिम मुहर लग गई। विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता श्रीलंका में चीन के बढ़ते सैन्य प्रभाव को संतुलित करने की भारत की रणनीति का हिस्सा है। इसके अलावा, दोनों देशों ने त्रिणकोमली को ऊर्जा हब के रूप में विकसित करने और समपुर सोलर पावर प्रोजेक्ट को शुरू करने जैसे महत्वाकांक्षी समझौतों पर भी सहमति जताई। इस प्रोजेक्ट का वर्चुअल उद्घाटन पीएम मोदी और राष्ट्रपति दिसानायके ने संयुक्त रूप से किया।
श्रीलंका के राष्ट्रपति ने इस अवसर पर पीएम मोदी को ‘लंका मित्र विभूषण’ सम्मान से नवाजा, जो श्रीलंका द्वारा मित्र देशों के नेताओं को दिया जाने वाला प्रतिष्ठित सम्मान है। समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, यह यात्रा दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में एक कदम है।
भारत-श्रीलंका संबंधों का इतिहास
पिछले 65 वर्षों में आठ भारतीय प्रधानमंत्रियों ने श्रीलंका का दौरा किया है। सबसे पहले 1962 में जवाहरलाल नेहरू ने श्रीलंका की यात्रा की थी, इसके बाद 1973 में इंदिरा गांधी वहां गईं। इंदिरा गांधी और श्रीलंका की तत्कालीन प्रधानमंत्री सिरिमाओ भंडारनायके के बीच 1974 में कच्छतीवु द्वीप समझौता हुआ था, जिसके तहत यह द्वीप श्रीलंका को सौंप दिया गया। हालांकि, तमिलनाडु ने इस फैसले का विरोध किया था।
1979 में मोरारजी देसाई और 1987 में राजीव गांधी ने भी श्रीलंका का दौरा किया। 1987 में राजीव गांधी पर सैन्य परेड के दौरान हमला हुआ था, जिसके बाद दोनों देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। इसके बाद 1991 में नरसिंह राव, 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी, 2008 में मनमोहन सिंह और 2015 में नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका की यात्राएं कीं। अब तक चार भारतीय प्रधानमंत्री- नेहरू, इंदिरा, देसाई और मोदी- श्रीलंकाई संसद को संबोधित कर चुके हैं।
नागरिकता और कच्छतीवु जैसे मुद्दे
1954 में नेहरू-कोटेलावाला समझौते के तहत श्रीलंका में भारतीय मूल के लोगों की नागरिकता का मुद्दा सुलझाने की कोशिश की गई, लेकिन यह समस्या पूरी तरह हल नहीं हुई। वहीं, कच्छतीवु द्वीप को लेकर विवाद आज भी जारी है। 1974-76 के बीच इंदिरा गांधी और सिरिमाओ भंडारनायके के बीच हुए समझौते से यह द्वीप श्रीलंका को मिला, लेकिन तमिलनाडु इसे वापस लेने की मांग करता रहा है।
1987 में राजीव गांधी और श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति जेआर जयवर्द्धने के बीच हुए समझौते ने श्रीलंकाई गृहयुद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) को उत्तरी श्रीलंका में तैनात किया गया, लेकिन एलटीटीई के साथ संघर्ष में 1,200 से अधिक भारतीय सैनिक शहीद हुए।
मोदी के नेतृत्व में नई उम्मीद
नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत-श्रीलंका संबंधों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने श्रीलंका को सबसे पहले वैक्सीन दी। 2022 में श्रीलंका के आर्थिक संकट के समय भारत ने 4 अरब डॉलर की सहायता दी। 2019 में ईस्टर संडे हमलों के बाद मोदी पहले विदेशी नेता थे, जिन्होंने श्रीलंका का दौरा किया था। उनकी यह यात्रा दोनों देशों के बीच भरोसे और सहयोग का प्रतीक बन गई है।

