बिहार के सारण जिले से गंगा नदी में पाई जाने वाली राष्ट्रीय जलीय जीव गंगा डॉल्फिन के साथ क्रूरता का एक मामला सामने आने के बाद संरक्षण उपायों की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में कुछ बच्चे और वयस्क गंगा, गंडक और घाघरा नदियों के संगम क्षेत्र में एक गंगा डॉल्फिन के बच्चे को पानी से बाहर निकालकर हवा में लहराते और उसके साथ तस्वीरें लेते दिखाई दे रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यह घटना बेहद चिंताजनक है, क्योंकि गंगा डॉल्फिन को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत सर्वोच्च सुरक्षा प्राप्त है और इसे लुप्तप्राय प्रजाति की श्रेणी में रखा गया है। वर्ष 2009 में भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया था।
गंगा डॉल्फिन स्वच्छ और गहरे मीठे जल में पनपती है तथा नदियों के संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र की महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है। बिहार के प्रसिद्ध “डॉल्फिन मैन” डॉ. आर.के. सिन्हा बताते हैं कि गंगा डॉल्फिन मछली नहीं बल्कि एक स्तनपायी जीव है, जिसे हर 30 से 40 सेकंड में सांस लेने के लिए पानी की सतह पर आना पड़ता है। दृष्टिहीन होने के कारण यह दिशा पहचानने के लिए इको लोकेशन तकनीक का उपयोग करती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 3 मार्च 2025 को जारी नदी डॉल्फिन गणना रिपोर्ट के अनुसार देश में गंगा डॉल्फिन की संख्या 6324 दर्ज की गई है। इनमें सबसे अधिक 2397 डॉल्फिन उत्तर प्रदेश में, जबकि बिहार में 2220 और पश्चिम बंगाल में 815 डॉल्फिन पाई गईं। बिहार की गंगा, गंडक, कोसी, बागमती और महानंदा जैसी नदियां इनके प्रमुख आवास क्षेत्र हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जल प्रदूषण, मछली पकड़ने वाले जाल, बांध-बैराज, ड्रेजिंग और मोटरबोटों का बढ़ता इस्तेमाल डॉल्फिन के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। पर्यावरणविद पी.के. दास के अनुसार, प्रदूषित जल और प्लास्टिक कचरा डॉल्फिन के जीवन चक्र को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। वहीं शोधार्थी संतोष कुमार सिंह का कहना है कि नावों और स्टीमर से उत्पन्न ध्वनि इनके इको लोकेशन सिस्टम को बाधित करती है, जिससे वे रास्ता भटक जाती हैं।
भागलपुर जिले में स्थित विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभ्यारण्य देश का एकमात्र डॉल्फिन अभ्यारण्य है, जहां संरक्षण के लिए विशेष निगरानी की जाती है। केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए “प्रोजेक्ट डॉल्फिन”, “नमामि गंगे” योजना तथा बिहार सरकार के जागरूकता अभियानों के तहत स्थानीय मछुआरों और युवाओं को “डॉल्फिन मित्र” के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है। इसके अलावा संकट में फंसी डॉल्फिनों को बचाने के लिए डॉल्फिन एंबुलेंस की भी तैयारी की जा रही है।
हालांकि, हालिया वायरल वीडियो ने यह साफ कर दिया है कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक लोगों में जागरूकता नहीं बढ़ेगी और नदियों को प्रदूषण मुक्त नहीं बनाया जाएगा, तब तक गंगा डॉल्फिन का अस्तित्व लगातार खतरे में बना रहेगा।

