पटना, 16 अप्रैल:
बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव दर्ज हुआ है। सम्राट चौधरी ने 15 अप्रैल को राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लंबे इंतज़ार को समाप्त कर दिया। करीब 21 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार के बाद यह पहला मौका है जब राज्य में बीजेपी का अपना मुख्यमंत्री बना है।
साल 2017 में बीजेपी में शामिल हुए सम्राट चौधरी ने महज छह वर्षों में प्रदेश अध्यक्ष से लेकर उपमुख्यमंत्री और अब मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया। यह राजनीतिक यात्रा पार्टी के धैर्य, रणनीति और संगठनात्मक मजबूती की कहानी भी बयां करती है।
बिहार में बीजेपी का सफर आसान नहीं रहा। 1962 में जनसंघ के रूप में महज तीन सीटों से शुरुआत करने वाली पार्टी लंबे समय तक गठबंधन की राजनीति में सीमित रही। कैलाशपति मिश्रा, के. एन. गोविंदाचार्य और सुशील कुमार मोदी जैसे नेताओं ने संगठन को मजबूत आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राज्य की राजनीति तीन प्रमुख दौरों से गुज़री—पहला कांग्रेस का प्रभुत्व, दूसरा गैर-कांग्रेसी दलों का उभार और तीसरा मंडल व सामाजिक न्याय की राजनीति, जिसमें लालू प्रसाद यादव का प्रभाव रहा। इसके बाद गठबंधन राजनीति के दौर में बीजेपी ने एक मजबूत सहयोगी के रूप में अपनी स्थिति बनाई।
1996 में बीजेपी और समता पार्टी का गठबंधन, 2005 में सत्ता में वापसी और 2010 में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद पार्टी को मुख्यमंत्री पद नहीं मिल सका। 2013 में गठबंधन टूटने और 2015 की हार के बाद भी बीजेपी ने संगठनात्मक विस्तार जारी रखा। 2017 में नीतीश कुमार की वापसी के साथ पार्टी फिर सत्ता में आई और 2020 में गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
आखिरकार 2025 में बीजेपी के सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसे पार्टी के लिए एक निर्णायक राजनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बदलाव न केवल बिहार में सत्ता संतुलन को पुनर्परिभाषित करता है, बल्कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति और विकास की दिशा भी तय करेगा।

