नई दिल्ली, 2 सितंबर।
भारत की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक कंपनी एनटीपीसी लिमिटेड (NTPC) ने चेतावनी दी है कि कोयला आधारित संयंत्रों को लगातार कम लोड पर चलाने से उनकी उम्र पर गंभीर असर पड़ सकता है।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) ने हाल ही में सुझाव दिया है कि ताप विद्युत संयंत्रों की तकनीकी न्यूनतम सीमा — यानी वह न्यूनतम स्तर जिस पर कोई यूनिट सुरक्षित रूप से संचालित हो सकती है — को वर्तमान 55% से घटाकर 40% किया जाए। यह कदम ग्रिड में सौर और पवन ऊर्जा के बढ़ते हिस्से को समायोजित करने की रणनीति का हिस्सा है। सीईए इसे अगले वर्ष से लागू करने की योजना बना रहा है।
लेकिन एनटीपीसी के परिचालन निदेशक रवींद्र कुमार का कहना है कि इतने कम स्तर पर लंबे समय तक संचालन से बॉयलरों और टर्बाइनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा, जिससे संयंत्र का जीवनकाल, जो सामान्यतः 25 साल होता है, एक तिहाई तक कम हो सकता है। कुमार ने पावरजेन इंडिया सम्मेलन के दौरान कहा कि एनटीपीसी ने अपनी न्यूनतम सीमा 55% तय रखी है ताकि लचीलेपन और परिसंपत्ति की सुरक्षा के बीच संतुलन बना रहे।
सीईए के अध्यक्ष घनश्याम प्रसाद ने इन आशंकाओं को आंशिक रूप से खारिज करते हुए कहा कि 40% पर संचालन संभव है, बशर्ते संयंत्रों में कुछ तकनीकी उन्नयन किए जाएं। उन्होंने माना कि इससे दक्षता पर असर जरूर पड़ेगा और ऐसे में क्षतिपूर्ति तंत्र पर विचार होना चाहिए।
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य तय किया है। इसके बावजूद कोयला ऊर्जा सुरक्षा की धुरी बना रहेगा। सरकार की योजना 2035 तक कोयला आधारित क्षमता को 97 गीगावाट तक बढ़ाने की है, जिससे कुल स्थापित क्षमता करीब 307 गीगावाट हो जाएगी। यह कदम सुनिश्चित करेगा कि नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में कमी के दौरान भी बिजली आपूर्ति बनी रहे।

