Homeभारत22 सालों में 72 हजार मौतें, 14 हजार शवों की नहीं हो...

22 सालों में 72 हजार मौतें, 14 हजार शवों की नहीं हो सकी पहचान

मुंबई की जीवनरेखा कही जाने वाली मुंबई लोकल ट्रेन से जुड़ी एक भयावह सच्चाई सामने आई है। हर साल हजारों लोग लोकल ट्रेनों से कटकर अपनी जान गंवा देते हैं। हाल ही में एक RTI (सूचना का अधिकार कानून) के तहत खुलासा हुआ है कि पिछले 15 वर्षों (2009 से 2024) के बीच 46,979 लोगों की मौत हुई, जिनमें से 14,513 शवों की अब तक पहचान भी नहीं हो सकी। इसका मतलब है कि हर तीसरे शव की शिनाख्त नहीं हो पाई।

RTI दाखिल करने वाले ऑर्थोपेडिक डॉक्टर सरोश मेहता के अनुसार, बीते 22 सालों (2002 से 2024) में मुंबई की लोकल ट्रेन नेटवर्क— सेंट्रल रेलवे, वेस्टर्न रेलवे और हार्बर लाइन — पर कुल 72,000 मौतें दर्ज की गईं। इनमें ज्यादातर मौतें ट्रैक पार करते वक्त या फिर चलती ट्रेन से गिरने की वजह से हुईं।

शव की पहचान क्यों नहीं हो पाती?

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि कई बार हादसे इतने भीषण होते हैं कि शव पहचानने लायक नहीं बचते। कई बार मोबाइल फोन, ID कार्ड या अन्य पहचान के साधन नहीं मिलते, जिससे परिजनों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।

पुलिस क्या करती है?

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया,

“जब किसी शव की पहचान नहीं हो पाती, तो उसे 15 दिन से एक महीने तक मोर्चरी में सुरक्षित रखा जाता है। इस दौरान उसकी तस्वीरें मुंबई के सभी पुलिस स्टेशनों को भेजी जाती हैं ताकि अगर कोई गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज हुई हो, तो उससे शव की पहचान की जा सके।”

अगर इस प्रक्रिया के बाद भी कोई परिजन नहीं आता, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शव का अंतिम संस्कार या दफन किया जाता है, बशर्ते शव के धर्म की पहचान हो सके। साथ ही शव के कुछ कपड़े और निजी सामान पुलिस रिकॉर्ड में सुरक्षित रखा जाता है।

‘Shodh’ वेबसाइट और पुलिस की पहलें

पहचान की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए GRP (गवर्नमेंट रेलवे पुलिस) ने एक समय ‘Shodh’ नाम से वेबसाइट शुरू की थी, जहां अज्ञात शवों की तस्वीरें और जानकारी अपलोड की जाती थीं। हालांकि कुछ समय बाद यह प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया।

इसके बाद रेलवे स्टेशनों पर मृतकों की तस्वीरों के बैनर लगाए गए, लेकिन यात्रियों की शिकायत पर इन्हें हटा दिया गया। इसके बावजूद पुलिस कई बार टैटू, कपड़ों के टैग या अन्य सुरागों से शव की पहचान करने में सफल होती है, लेकिन हर बार ऐसा संभव नहीं हो पाता।

डॉ. मेहता ने बताया कि मोर्चरी में जगह की कमी के कारण कई बार शवों को लंबे समय तक नहीं रखा जा सकता और जल्द ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाता है।

आंकड़ों में बदलाव और उपाय

डॉ. मेहता के अनुसार, 2012 के बाद से मौतों के आंकड़ों में कुछ कमी आई थी, हालांकि कोविड काल के दौरान यह संख्या असाधारण रूप से गिर गई। लेकिन जैसे ही कामकाजी जीवन सामान्य हुआ, मौतों की संख्या फिर से बढ़ने लगी है। पिछले पांच वर्षों से यह ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है।

उन्होंने सुझाव दिया कि बाउंड्री वॉल और क्लोज्ड-डोर कोच के ज़रिए ट्रैक पार करते समय और ट्रेन से गिरने की घटनाएं रोकी जा सकती हैं। हालांकि रेलवे ने फुट ओवर ब्रिज और एस्केलेटर जैसी सुविधाएं विकसित की हैं, लेकिन हर साल हजारों मौतें यह दिखाती हैं कि ‘जीरो डेथ मिशन’ अभी भी अधूरा है।

मुंबई लोकल, जो हर दिन लाखों लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाती है, वही ट्रेन हजारों परिवारों के लिए स्थायी जख्म भी बन जाती है। आंकड़े सिर्फ संख्याएं नहीं हैं, बल्कि हर आंकड़ा एक ज़िंदगी और उससे जुड़ी कहानियों का अंत है।

Rishik Dwivedi
Rishik Dwivedi
Founder Member & Sub- Editor of NTF
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -spot_img

Most Popular

Recent Comments