लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल में शिक्षकों की भर्ती में अनियमितताओं से जुड़े मामले को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र लिखा है। उन्होंने राष्ट्रपति से इस मामले में हस्तक्षेप करने और सरकार से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया है कि निष्पक्ष तरीके से चयनित शिक्षकों को उनकी नौकरी जारी रखने की अनुमति दी जाए।
राहुल गांधी ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं पाईं और इसे पूरी तरह अमान्य घोषित कर दिया था। इसके बाद 3 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा। इन फैसलों के परिणामस्वरूप हजारों शिक्षकों ने अपनी नौकरी गंवा दी, जिससे उनकी उम्मीदें टूट गईं। दोनों अदालतों ने यह भी पाया कि कुछ उम्मीदवार निष्पक्ष तरीके से चुने गए थे और “बेदाग” थे, जबकि कुछ “दागी” उम्मीदवार अनुचित तरीकों से भर्ती हुए थे। हालांकि, फैसले के बाद दोनों ही श्रेणियों के शिक्षकों की नौकरी चली गई।
राहुल गांधी ने पत्र में लिखा, “भर्ती प्रक्रिया में किसी भी अपराध के लिए सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और दोषियों को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए। लेकिन बेदाग शिक्षकों के साथ दागी जैसा व्यवहार करना सरासर अन्याय है।” उन्होंने बताया कि प्रभावित शिक्षकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने शिक्षक शिक्षा अधिकार मंच के माध्यम से उनसे मुलाकात की और राष्ट्रपति को पत्र लिखने का विशेष अनुरोध किया।
उन्होंने आगे कहा कि अधिकांश “बेदाग” शिक्षक करीब एक दशक से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इन्हें नौकरी से निकालने का असर न केवल इन शिक्षकों और उनके परिवारों पर पड़ेगा, बल्कि लाखों छात्र भी शिक्षकों के अभाव में पढ़ाई से वंचित होंगे। राहुल गांधी ने चिंता जताई कि इससे शिक्षकों का मनोबल टूटेगा, उनकी सेवा भावना खत्म होगी और उनके परिवार आय के एकमात्र स्रोत से वंचित हो जाएंगे।
राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने लिखा, “आप स्वयं एक शिक्षक रही हैं। मुझे विश्वास है कि आप शिक्षकों, उनके परिवारों और छात्रों पर इस अन्याय के मानवीय प्रभाव को समझती हैं।” उन्होंने राष्ट्रपति से अपील की कि वे इस मामले पर सकारात्मक विचार करें और सरकार से हस्तक्षेप का आग्रह करें, ताकि निष्पक्ष तरीके से चुने गए शिक्षकों को उनकी नौकरी बरकरार रखने का अधिकार मिल सके।
यह पत्र पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती घोटाले के बाद उत्पन्न संकट को उजागर करता है, जहां न्यायिक फैसलों ने व्यापक असर डाला है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राष्ट्रपति इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती हैं।

