दमोह की एक ठंडी सुबह थी, जब रहीसा कुरैशी को अचानक सीने में तेज़ जलन और दर्द महसूस हुआ। उनका बेटा नबी आनन-फानन में उन्हें मिशन अस्पताल लेकर पहुँचा, जहाँ मौजूद एक डॉक्टर ने बिना वक्त गंवाए “इमरजेंसी सर्जरी” की सलाह दे दी।
14 जनवरी को रहीसा की एंजियोप्लास्टी की गई। मगर अगले ही दिन हालात फिर बिगड़े — उन्हें दोबारा दिल का दौरा पड़ा, और वेंटिलेटर पर डाल दिया गया। कुछ ही घंटों में उनकी साँसें थम गईं। अस्पताल प्रशासन ने सारा मामला ‘स्वाभाविक मौत’ बताकर टाल दिया: “हार्ट अटैक था, कुछ नहीं किया जा सकता था।”
पर यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
कई महीने बाद जब नबी ने टीवी चैनलों पर यह खबर देखी कि दमोह के उसी मिशन अस्पताल में एक फ़र्ज़ी डॉक्टर — डॉ. एन. जॉन कैम — बिना डिग्री के अब तक 15 से ज़्यादा सर्जरी कर चुका है, तो जैसे उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। उसे यकीन हो गया कि उसकी माँ की मौत लापरवाही नहीं, बल्कि ठगी और धोखाधड़ी की वजह से हुई थी।
अब सवाल उठ रहे हैं — कैसे एक नकली डॉक्टर इतने लंबे समय तक एक प्रतिष्ठित अस्पताल में काम करता रहा? सिस्टम की नाकामी या मिलीभगत? और जो ज़िंदगियाँ इससे तबाह हुईं, उन्हें कौन जवाब देगा?

