फै़ज़ाबाद। जनवादी लेखक संघ, फै़ज़ाबाद द्वारा स्त्री रचनाधर्मिता पर केन्द्रित ‘स्त्री-स्वर’ कार्यक्रम का आयोजन युवा लेखक डॉ राजीव श्रीवास्तव के नाका स्थित आर.बी. टॉवर सभागार में किया गया। यह गोष्ठी मुख्यतः स्त्री लेखन विषयक वैचारिक चर्चा और रचनापाठ पर केन्द्रित रही। गोष्ठी की मुख्य अतिथि एडवोकेट ऋतु राठौर ने कहा कि आज के स्त्री लेखन को यह प्रयास करना चाहिए कि वह एक लैंगिक बराबरी से समृद्ध समाज का निर्माण कर सके। उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में स्त्री की स्थिति में परिवर्तन हुए हैं और सामान्यीकृत रूप में अब उसे पीड़िता या अबला की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। समाजसेवी डॉ अलका सिंह ने कहा कि स्त्री रचनाकारों को नये समय के साथ चलकर नये विचारों को आत्मसात करना चाहिए। शिक्षिका और समाजसेवी सुश्री अर्चना सिंह ने कहा कि आज स्त्रियों को आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की आवश्यकता है, जिससे वे समाज में अपनी स्थिति को सुदृढ़ बना सकें। कार्यक्रम की संयोजक विनीता कुशवाहा ने अपनी ग़ज़लों और कविताओं के माध्यम से यह कहने की कोशिश की कि आज के आधुनिक समय में भी स्त्रियों के समक्ष कई तरह की चुनौतियाँ हैं, ख़ासकर उन स्त्रियों के सामने, जो वंचित या हाशिए के वर्ग से आती हैं। गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए फै़ज़ाबाद इकाई के अध्यक्ष एवं उर्दू के आलोचक मो. ज़फर ने कहा कि वर्षों से स्त्री-लेखन ने साहित्य की मुख्यधारा पर अपना प्रभाव डाला है। उन्होंने रचनापाठ में सम्मिलित स्त्री रचनाकारों की रचनाओं पर बात करते हुए कहा कि इन कविताओं, गीतों और ग़ज़लों में आधी आबादी की आवाज़ ज़ोरदार ढंग से गूँजती हुई दिखाई देती है। कवि-प्राध्यापक डॉ. विशाल श्रीवास्तव ने कहा कि साहित्य की मुख्यधारा के आलोचकों की यह सीमा रही कि लम्बे समय तक साहित्य के स्त्री-स्वरों को पर्याप्त महत्व के साथ रेखांकित नहीं किया जा सका। उन्होंने दक्षिण के वीरशैव आंदोलन की विद्रोहिणी कवयित्री अक्क महादेवी की चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी के बड़े आलोचकों के यहाँ भी उनका ज़िक्र नहीं मिलता है, जबकि वे क्रांतिधर्मी स्त्री-स्वर का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी प्रकार हिंदी नवजागरण की बहुत सी लेखिकाओं के महत्व और योगदान को हम आज जाकर समझ पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जनवादी लेखक संघ के ‘स्त्री-स्वर’ कार्यक्रम का उद्देश्य स्त्री रचनाधर्मिता के माध्यम से समूची वंचित अस्मिताओं की आवाज़ को मुख्यधारा में लाना है। आलोचक-कवि डॉ. आर. डी. आनंद ने कहा कि स्त्री विमर्श के नये संदर्भों के आईने में स्त्री रचनाकारों के लेखन को देखने की ज़रूरत है। उनके अनुसार यह महत्वपूर्ण है कि आज जब स्त्रियाँ अपनी बात कह रही हैं तो उनकी मुक्ति के स्वप्न का आकाश किन आकांक्षाओं से निर्मित होता है। जलेस के कोषाध्यक्ष और शायर मुज़म्मिल फिदा ने कहा कि आज का कार्यक्रम एक मिसाल की तरह सामने है कि स्त्रियाँ अब नेतृत्वकारी भूमिकाओं में भी सामने आने लगी हैं। उन्होंने कहा कि आज के समय की मांग है कि स्त्रियाँ भी आगे आकर आंदोलनधर्मिता में अपनी सहभागिता प्रस्तुत करें। जलेस के वरिष्ठ सदस्य और शायर एड. रामजीत यादव ‘बेदार’ ने कहा कि एक पुरुष के रूप में यह विचार आता है कि कई ऐसे उदात्त भाव हैं जो केवल स्त्रियों के हिस्से में आए हैं और उनसे प्रेरित-ऊर्जस्वित होने की इच्छा मन में आती है।

उन्होंने कहा कि कोई भी बड़ा सामाजिक-साहित्यिक आंदोलन स्त्रियों के बिना सम्भव नहीं है। कवयित्री और गोष्ठी की संयोजक पूजा श्रीवास्तव ने अपने कुशल संचालन और कविता पाठ के माध्यम से स्त्री जीवन की पीड़ाओं को सामने रखा और यह कहने का प्रयास किया कि स्त्रीमुक्ति का स्वप्न अभी भी अधूरा है। पत्रकार और कवयित्री कुमकुम भाग्या ने अपनी कविताओं के माध्यम से ग्रामीण स्त्री के जीवन की चुनौतियों को साहित्य के बरअक़्स रखने की कोशिश की। जलेस के सदस्य बृजेश श्रीवास्तव ने अतिथियों को स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए कहा कि मौजूदा समय में स्त्री ने अपनी एक मज़बूत पहचान अर्जित की है। युवा कवि राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि आज का स्त्री-लेखन विविधआयामी है और उसमें गहरे वैचारिक सूत्र मौजूद हैं। एडवोकेट गिरीश तिवारी ने कार्यक्रम को सराहते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों को निरंतरता से आयोजित करने की ज़रूरत है। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सत्यभान सिंह जनवादी ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों से साहित्य की परंपरा में स्त्री लेखन की उपस्थिति को बल मिलेगा। उन्होंने कहा कि स्त्रियों की रचनाओं की उपस्थिति के बिना आज के समय में साहित्य की कल्पना करना असंभव है। कार्यक्रम में सुश्री प्रेरणा, डॉ. संदीपा दीक्षित, डॉ. पूनम यादव आदि रचनाकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। गोष्ठी में जलेस के सदस्यगण और युवा शायर रवीन्द्र कबीर, संतोष अकेला, चन्द्रगत भारती, महावीर पाल, आरती सिंह चौहान,ग्राम विकास अधिकारी निहा सिंह,मालती तिवारी,शिवांगी नंदा,गरिमा सिंह,सहित दर्जनों संख्या में रचनाकार एवं साहित्य-संस्कृति कर्मी उपस्थित रहे।

