तमिलनाडु में नेताओं की हत्या का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में शिवगंगई जिले में बीजेपी कार्यकर्ता सेल्वाकुमार की हत्या ने राज्य में राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया है। इस घटना के बाद राज्य में कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सेल्वाकुमार की हत्या का मामला
शिवगंगई जिले के बीजेपी जिला सचिव सेल्वाकुमार शनिवार को अपने ईंट भट्टे से दोपहिया वाहन पर घर लौट रहे थे। इसी दौरान कुछ अज्ञात हमलावरों ने उन्हें घेर लिया और उन पर हमला कर उनकी हत्या कर दी। राहगीरों ने खून से लथपथ सेल्वाकुमार को सड़क पर पड़ा देखा और तुरंत अधिकारियों को सूचित किया। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर पाया कि सेल्वाकुमार की मौत हो चुकी है और उनके शव को सरकारी अस्पताल भेजा गया।
हत्या के बाद राजनीतिक बयानबाजी
सेल्वाकुमार की हत्या के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने सड़क जाम कर दी और शव को लेने से इनकार कर दिया। उनकी मांग थी कि दोषियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए। राज्य भाजपा प्रमुख के अन्नामलाई ने इस हत्या की निंदा करते हुए डीएमके सरकार पर कानून व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “असामाजिक तत्वों को सरकार या पुलिस का कोई डर नहीं है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को आत्मचिंतन करना चाहिए कि क्या उन्हें राज्य के मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का अधिकार है।”
सांसद कार्ति पी. चिदंबरम का बयान
शिवगंगई के सांसद कार्ति पी. चिदंबरम ने इस हत्या में किसी राजनीतिक संबंध से इनकार किया। उन्होंने कहा कि यह हत्या दो समूहों के बीच दुश्मनी का परिणाम है। उन्होंने एसपी से बात कर संदिग्धों की गिरफ्तारी का आश्वासन दिया और कहा, “हत्या के संबंध में शिवगंगा जिले के एसपी ने बताया कि यह दो समूहों के बीच दुश्मनी के कारण हुई है और इसमें कोई राजनीतिक कोण नहीं है।”
तमिलनाडु में हत्याओं की बढ़ती घटनाएँ
पिछले 24 घंटों में राज्य में यह दूसरी राजनीतिक हत्या है। शनिवार को ही तमिलनाडु के कुड्डालोर में AIADMK के एक कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई थी। 5 जुलाई को बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के. आर्मस्ट्रांग की एक गिरोह ने हत्या कर दी थी, जिसके कारण व्यापक आक्रोश फैल गया था।
तमिलनाडु में राजनीतिक हत्याओं की बढ़ती घटनाओं ने राज्य की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह स्थिति न केवल राज्य की सुरक्षा प्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि राजनीतिक स्थिरता और जनता के विश्वास को भी हिलाती है।

