Homeलेखसड़क बनी सुविधा, टोल बनी बाधा

सड़क बनी सुविधा, टोल बनी बाधा

भारत में सड़कें केवल यातायात का साधन नहीं होतीं, वे जीवन, आजीविका और आपात स्थितियों की रीढ़ होती हैं। गाँव से शहर, खेत से मंडी, घर से अस्पताल और स्कूल से कार्यालय—हर सफर इन्हीं सड़कों पर तय होता है। सरकारें इन्हें विकास का प्रतीक बताती हैं, लेकिन इन्हीं सड़कों पर खड़ी टोल टैक्स की व्यवस्था आज आम नागरिक के लिए सुविधा से ज़्यादा विरोधाभासों और अन्याय का प्रतीक बनती जा रही है। समस्या केवल पैसे की नहीं है, समस्या उस सोच की है जहाँ नीति का केंद्र इंसान नहीं, बल्कि वाहन और वसूली बन गई है।
टोल टैक्स की मूल अवधारणा यह थी कि सड़क निर्माण और रखरखाव के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाए जाएँ, विशेषकर उन वाहनों से जो सड़कों का व्यावसायिक उपयोग करते हैं। ट्रक, बसें और भारी कमर्शियल वाहन न केवल सड़कों को ज़्यादा नुकसान पहुँचाते हैं, बल्कि उन्हीं सड़कों से मुनाफा भी कमाते हैं। लेकिन समय के साथ यह तर्क धुंधला पड़ गया और आज स्थिति यह है कि निजी उपयोग की गाड़ियाँ—जो न सड़क से कमाई करती हैं, न ही भारी भार डालती हैं—उन्हें भी उसी तराजू में तौला जा रहा है। यही से टोल नीति के विरोधाभास शुरू होते हैं।
सबसे गहरा और मानवीय विरोधाभास स्वास्थ्य सेवाओं के संदर्भ में सामने आता है। नीति के अनुसार एंबुलेंस को टोल टैक्स से मुक्त रखा गया है, जो सिद्धांततः बिल्कुल सही है। लेकिन वास्तविक जीवन इससे कहीं अधिक जटिल है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में एंबुलेंस की उपलब्धता सीमित है, कई बार समय पर एंबुलेंस नहीं मिलती या उसका खर्च वहन करना हर परिवार के लिए संभव नहीं होता। ऐसे में मजबूरी में मरीज को निजी वाहन से बड़े शहर—जैसे लखनऊ—ले जाया जाता है। यहीं व्यवस्था का असली चेहरा सामने आता है। वही मरीज, वही आपात स्थिति, वही हाईवे—लेकिन वाहन बदलते ही राहत खत्म हो जाती है। निजी वाहन में बैठे मरीज से हर टोल प्लाज़ा पर शुल्क लिया जाता है। यानी नीति यह मानकर चलती है कि आपातकालीन स्थिति मरीज की हालत से नहीं, बल्कि वाहन के प्रकार से तय होगी। यह विरोधाभास न सिर्फ अमानवीय है, बल्कि जीवन के अधिकार पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
इसी तरह दुर्घटनाओं के मामलों में भी तस्वीर अलग नहीं है। सड़क हादसे के बाद घायल को तुरंत अस्पताल पहुँचाना जीवन और मौत का सवाल होता है। अगर एंबुलेंस उपलब्ध नहीं है और कोई निजी वाहन उसे लेकर भागता है, तो टोल नियम उसके रास्ते में बाधा बन सकते हैं। क्या नियम इंसानी जान से बड़े हो सकते हैं? यह प्रश्न नीति निर्माताओं से जवाब मांगता है।
एक और बड़ा विरोधाभास दोहरी वसूली का है। आम नागरिक जब वाहन खरीदता है, तो रोड टैक्स देता है। पेट्रोल-डीज़ल पर भारी कर देता है। जीएसटी और अन्य अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से भी वह इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में योगदान करता है। इसके बावजूद, उसी सड़क पर चलने के लिए टोल टैक्स देना पड़ता है। कमर्शियल वाहन इस लागत को अपने किराए और मुनाफे में जोड़ लेते हैं, लेकिन निजी वाहन चलाने वाला नागरिक यह बोझ सीधे अपनी जेब से देता है। सवाल यह है कि जब सड़क का भुगतान पहले ही टैक्स के रूप में हो चुका है, तो आम आदमी से बार-बार वसूली क्यों?
ग्रामीण भारत में यह विरोधाभास और तीखा हो जाता है। किसान जब अपनी उपज मंडी तक ले जाता है, तो वह कोई व्यापारिक सौदा नहीं कर रहा होता, बल्कि अपनी मेहनत की फसल बेचने जा रहा होता है। मंडी के भाव वह तय नहीं करता, परिवहन लागत वह नियंत्रित नहीं करता। फिर भी रास्ते में लगने वाला टोल उसकी आय को सीधे कम करता है। वहीं बड़ा व्यापारी उसी सड़क का इस्तेमाल कर अपना मुनाफा बढ़ाता है और टोल की राशि उपभोक्ता पर डाल देता है। नीति का बोझ हमेशा कमजोर पर ही क्यों पड़ता है—यह सवाल बार-बार उभरता है।
टोल नीति में समानता का दावा भी एक भ्रम जैसा लगता है। सांसद और विधायक टोल से मुक्त रहते हैं, जबकि आम नागरिक भुगतान करता है। लोकतंत्र में कानून सबके लिए समान होने की बात कही जाती है, लेकिन सड़क पर यह समानता गायब हो जाती है। जिन प्रतिनिधियों को जनता ने चुना है, वही जनता टोल की कतार में खड़ी है और उनके प्रतिनिधि बिना रुके निकल जाते हैं। यह दृश्य नीति से ज़्यादा व्यवस्था की मानसिकता को उजागर करता है।
डिजिटल युग में FASTag को सुविधा के रूप में पेश किया गया, लेकिन यह भी अपने साथ नए विरोधाभास लेकर आया। पैसा कटने में एक सेकंड लगता है, लेकिन गलत कटौती की शिकायत सुलझाने में हफ्ते और महीने लग जाते हैं। आम नागरिक के पास न तो लंबी शिकायत प्रक्रिया से लड़ने का समय है, न ही संसाधन। डिजिटल व्यवस्था यहाँ सुविधा से ज़्यादा एकतरफा शक्ति का रूप ले लेती है, जहाँ नागरिक उपभोक्ता नहीं बल्कि मजबूर भुगतानकर्ता बन जाता है।
स्थानीय निवासियों की समस्या भी कम गंभीर नहीं है। टोल प्लाज़ा के आसपास रहने वाले लोग रोज़मर्रा के काम—स्कूल, अस्पताल, बाजार, खेत—के लिए उसी सड़क का इस्तेमाल करते हैं और रोज़ टोल देते हैं। दूसरी ओर, कोई बाहरी यात्री कभी-कभार उसी सड़क से गुजरता है और उतना ही शुल्क देता है। नीति स्थानीय जरूरतों और मजबूरियों को पहचानने में असफल दिखाई देती है।
सबसे बड़ा प्रश्न टोल वसूली की समय-सीमा का है। नियम कहते हैं कि एक निश्चित अवधि में सड़क की लागत वसूल होने के बाद टोल हट जाना चाहिए। लेकिन व्यवहार में कई सड़कें वर्षों पहले अपनी लागत निकाल चुकी हैं, फिर भी टोल जारी है। कहीं-कहीं एक ही मार्ग पर कुछ किलोमीटर के अंतराल में कई टोल प्लाज़ा खड़े हैं। इससे यह संदेह गहराता है कि टोल अब रखरखाव का साधन नहीं, बल्कि स्थायी राजस्व और मुनाफे का मॉडल बन चुका है।
इन तमाम विरोधाभासों को जोड़कर देखें तो साफ होता है कि टोल टैक्स की मौजूदा व्यवस्था इंसान-केंद्रित नहीं, बल्कि वाहन और वसूली-केंद्रित है। नीति मरीज को नहीं, एंबुलेंस को पहचानती है; किसान को नहीं, वाहन को देखती है; नागरिक को नहीं, फास्टैग को महत्व देती है। यही वह बुनियादी समस्या है, जिसे बदले बिना कोई भी सुधार अधूरा रहेगा।
समाधान असंभव नहीं हैं। टोल टैक्स को केवल कमर्शियल गाड़ियों तक सीमित किया जा सकता है। निजी गाड़ियों के लिए सस्ती या निःशुल्क व्यवस्था लागू की जा सकती है। आपातकालीन स्थितियों में निजी वाहन से ले जाए जा रहे मरीजों के लिए भी टोल से राहत दी जा सकती है। स्थानीय निवासियों को स्वतः छूट और टोल की समय-सीमा का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जा सकता है। तकनीक का इस्तेमाल वसूली के लिए नहीं, बल्कि इंसानी संवेदनाओं को प्राथमिकता देने के लिए होना चाहिए।
अंततः सवाल यही है कि सड़कें किसके लिए हैं—जनता के लिए या वसूली के लिए? अगर विकास की सड़क पर चलते हुए आम आदमी हर मोड़ पर भुगतान और अपमान झेले, तो उस विकास की सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कमर्शियल गाड़ियाँ कमाती हैं—वे टोल दें।
आम नागरिक जीने, बचाने और पहुँचने के लिए सफर करता है—उसे राहत मिलनी ही चाहिए।

✍️ अखिल कुमार यादव

Rishik Dwivedi
Rishik Dwivedi
Founder Member & Sub- Editor of NTF
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -spot_img

Most Popular

Recent Comments