राष्ट्रसंत संत गाडगे महाराज की 150वीं जयंती देशभर में श्रद्धा, उत्साह और जनसेवा कार्यक्रमों के साथ मनाई जा रही है। 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेंडगांव में जन्मे देबूजी जिंगराजी जनोरकर ने अपना संपूर्ण जीवन समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
गरीब धोबी परिवार में जन्म लेने वाले गाडगे महाराज ने साधनहीनता को अपनी शक्ति बनाया। उन्होंने मठ-मंदिरों में रहने के बजाय गांव-गांव घूमकर जनजागरण किया। झाड़ू और ‘गाडगे’ (मटका) हाथ में लेकर वे स्वयं सड़कों, नालियों और मंदिर परिसरों की सफाई करते और लोगों को संदेश देते—“स्वच्छता ही सेवा है, स्वच्छता ही भक्ति है।”
स्वच्छता अभियान के प्रेरणास्रोत
महाराष्ट्र सरकार द्वारा संचालित ‘संत गाडगे बाबा ग्राम स्वच्छता अभियान’ सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों ने आज विशेष सफाई कार्यक्रम आयोजित किए। वक्ताओं ने कहा कि देश में स्वच्छता को जनआंदोलन बनाने की जो सोच आज दिखती है, उसकी जड़ें गाडगे महाराज के प्रयासों में देखी जा सकती हैं।
शिक्षा पर विशेष जोर
गाडगे महाराज शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का मूल आधार मानते थे। वे कहा करते थे, “शिक्षा के लिए थाली भी बेच दो, लेकिन पढ़ाई मत छोड़ो।” उन्होंने 31 से अधिक शैक्षणिक संस्थाओं—स्कूल, कॉलेज और छात्रावास—की स्थापना की, जिनका लाभ विशेष रूप से गरीब, दलित और पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों को मिला।
सेवा संस्थाओं की स्थापना
संत गाडगे महाराज ने 100 से अधिक धर्मशालाएं, अनाथालय, वृद्धाश्रम, कुष्ठ आश्रम, अपंगों के लिए सदावर्त और गोरक्षण केंद्र स्थापित करवाए। पंढरपुर, नासिक, देहू और आळंदी जैसे तीर्थस्थलों पर उनके द्वारा बनाई गई धर्मशालाएं आज भी गरीब यात्रियों की सेवा कर रही हैं।
अंधविश्वास और जातिवाद के विरुद्ध आवाज
अपने कीर्तनों के माध्यम से उन्होंने जातिवाद, अस्पृश्यता, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया। वे कहते थे, “देव मंदिर में नहीं, दीन-दुखियों की सेवा में बसता है।” सरल भाषा में दिए गए उनके संदेश ने ग्रामीण समाज में गहरी चेतना पैदा की।
डॉ. आंबेडकर से आत्मीय संबंध
संत गाडगे महाराज और B. R. Ambedkar के बीच गहरा सम्मान और वैचारिक निकटता थी। दोनों का उद्देश्य समान था—सामाजिक समानता, शिक्षा का प्रसार और जातिगत भेदभाव का अंत।
12 जुलाई 1949 को पंढरपुर में हुई उनकी ऐतिहासिक मुलाकात का उल्लेख आज भी किया जाता है। डॉ. आंबेडकर ने गाडगे महाराज को महान जनसेवक बताया था, वहीं गाडगे महाराज अपने कीर्तनों में आंबेडकर के संघर्ष और शिक्षा के महत्व का उदाहरण देते थे।
6 दिसंबर 1956 को डॉ. आंबेडकर के महापरिनिर्वाण के बाद गाडगे महाराज गहरे शोक में डूब गए और 20 दिसंबर 1956 को उनका भी देहावसान हो गया।
पद्म भूषण से सम्मान
भारत सरकार ने उनके असाधारण सामाजिक योगदान के लिए उन्हें ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया।
आज उनकी 150वीं जयंती पर देशभर में एक ही संदेश गूंज रहा है—
“सेवा ही धर्म है, श्रम ही पूजा है, स्वच्छता ही प्रगति है।”

