अयोध्या। जनवादी लेखक संघ के ४५वें स्थापना दिवस के अवसर पर जलेस फैजाबाद द्वारा ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समय में विचार और रचनाशीलता’ विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन जनमोर्चा सभागार में किया गया। जलेस इकाई के अध्यक्ष मो ज़फ़र ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मनुष्य की बुद्धि की बराबरी रचनात्मक क्षेत्र में कभी नहीं कर सकती। उनके अनुसार किसी भी भाषा के बड़े रचनाकार जिस तरह सोचते हैं वह प्रविधि एकदम अलग होती है।

परिचर्चा की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ आलोचक डॉ सी बी भारती ने कहा मैं भयभीत हूँ कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता से विकसित वैचारिकता का कोई समावेशी उपयोग संभव हो पाएगा। उनके अनुसार यह एक चुनौती है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत के संविधान के आदर्शों के साथ चलते हुए समाज के हाशिए के वर्गों के हितों का साधन करने में भी सक्षम होगा।

वरिष्ठ आलोचक रघुवंशमणि ने कहा कि कला और रचनात्मकता के क्षेत्र में नयेपन का अत्यधिक महत्त्व है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिल्प में सहायता कर सकती है लेकिन विचार की मौलिकता एक अलग चीज़ है। एक अच्छी पेंटिंग बनाने या अच्छी कविता लिखने का काम कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भरोसे नहीं किया जा सकता। कलाकृति के वास्तविक मूल्यों का निवेश मानवीय दृष्टिकोण के बिना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि यह बड़ी चुनौती है कि तकनीक ने चीज़ों को इस तरह बदल दिया है कि हमारी संस्कृति बदलती जा रही है। उन्होंने कहा कि यह एक संवेदनशील मामला है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर किस तरह सत्ता का नियंत्रण होने वाला है।

कवि-चिंतक आर डी आनंद ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसका नियंत्रण मनुष्य के हाथ में है और हम इसे नियंत्रित कर सकते हैं। एआई कभी भी मानवीय सर्जक की जगह नहीं ले सकता है।

विषय प्रवर्तन करते हुए कवि-प्राध्यापक डॉ विशाल श्रीवास्तव ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में विचार और रचनाशीलता को परिभाषित करते हुए कहा कि इस समय में मानवीय संवेदनाओं के समक्ष अब एक बड़ी चुनौती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता फिलहाल एक सिंथेसिस की तरह रचनात्मक अनुकरण का काम कर रही है और वह ऐसा कुछ अभिनव नहीं रच रही जो पहले से मौजूद न हो। उनके अनुसार आधारभूत चीज़ों के बारे में विचार में सहयोग तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता करती है लेकिन उच्च श्रेणी के दार्शनिक विचार की क्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विशेष रूप से भारत के सामाजिक संदर्भों और स्थितियों में विचार के मामले में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पूरी तरह अक्षम है।
कवि आशाराम जागरथ ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता बहुत से मामलों में सहायक भी है लेकिन उसके खतरे भी हैं। आवश्यक है कि इस प्रणाली के नियंत्रण के सम्यक उपाय किए जायें।
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए संयोजक सत्यभान सिंह जनवादी ने कहा कि एआई तकनीक के माध्यम से समाज समूचे तौर पर प्रभावित हो रहा है। यह ज़रूरी है कि हम विचार और रचनाशीलता के समक्ष कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका का विश्लेषण करें।
अपने संचालन में मुजम्मिल फ़िदा ने सभी पहलुओं पर बात करते हुए प्रस्तुत विचार सूत्रों का समाहार करते हुए अपना पक्ष भी प्रस्तुत किया।
परिचर्चा में जलेस इकाई के वरिष्ठ सदस्य रामजीत यादव बेदार, अखिलेश सिंह, पूजा श्रीवास्तव, डॉ नीरज सिन्हा नीर, बृजेश श्रीवास्तव, ओम प्रकाश रोशन, वाहिद अली, रविन्द्र कबीर, राजीव श्रीवास्तव, वेदिक द्विवेदी, ऋषिक द्विवेदी और संदीपा दीक्षित ने भी अपने विचार रखे।

