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हर लेखक अपनी परंपरा से कुछ न कुछ अर्जित करता है : शिवमूर्ति

अयोध्या। हिंदी साहित्य के वरिष्ठ कथाकार एवं चर्चित उपन्यास ‘अगम बहै दरियाव’ के लेखक शिवमूर्ति के अयोध्या आगमन पर शहर में एक आत्मीय संवाद गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह साहित्यिक बैठक साहित्यकार आशाराम जागरथ के आवास पर संपन्न हुई, जिसमें नगर के वरिष्ठ कवि-लेखकों के साथ बड़ी संख्या में युवा साहित्यप्रेमी भी शामिल हुए।

गोष्ठी में अपनी रचना-प्रक्रिया पर विस्तार से बात करते हुए शिवमूर्ति ने कहा कि उनका लेखन समाज के यथार्थ से गहराई से जुड़ा है और उनकी अधिकांश रचनाओं के पात्र वास्तविक जीवन से आए हैं। उन्होंने कहा कि विभिन्न शहरों और सामाजिक परिस्थितियों में बिताया गया जीवन उनके लेखन का आधार बना, अन्यथा शायद वे ऐसी कहानियां नहीं लिख पाते।

प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु की परंपरा से जुड़े होने के सवाल पर शिवमूर्ति ने कहा कि हर लेखक अपनी परंपरा से कुछ न कुछ ग्रहण करता है, लेकिन वह अपने समय की चुनौतियों और प्रश्नों के अनुसार उसमें नया भी जोड़ता है। समय के बदलते संदर्भ ही किसी लेखक की मौलिकता तय करते हैं।

कवि-प्राध्यापक डॉ. विशाल श्रीवास्तव के सवालों के जवाब में शिवमूर्ति ने कहा कि उनके साहित्य में सामाजिक-राजनीतिक आशय किसी पूर्व नियोजित योजना के तहत नहीं आते, बल्कि जीवन के पर्यवेक्षण के दौरान उपजी करुणा और पीड़ा अवचेतन में जाकर रचना का हिस्सा बन जाती है। किसान आत्महत्या जैसे संवेदनशील विषय पर आधारित ‘अगम बहै दरियाव’ के संदर्भ में उन्होंने बताया कि यह उपन्यास विभिन्न घटनाओं के समेकित प्रभाव से निर्मित है और इसमें विषय के हर आयाम को समेटने का प्रयास किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि उपन्यास के सूक्ष्म पाठ से ही मंगल सिंह और माठा बाबा जैसे अलक्षित नायकों की केंद्रीय भूमिका को समझा जा सकता है।

डॉ. विशाल श्रीवास्तव ने उपन्यास में पुरुष जीवन की त्रासदी से जुड़े प्रसंग को हिंदी कथा-साहित्य में विरल और अत्यंत मार्मिक बताया। आलोचक डॉ. रघुवंशमणि ने कहा कि साहित्य में यथार्थ कभी सपाट रूप में नहीं आता, बल्कि वह कई जटिल स्तरों से होकर पाठक तक पहुंचता है। उन्होंने परंपरा के सवाल पर भी कहा कि लेखक अपनी परंपरा से तात्विक रूप से जुड़ा होता है, न कि सतही संकेतों के माध्यम से।

वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने शिवमूर्ति की कहानियों की पठनीयता और पाठक को बांधे रखने की शक्ति की सराहना करते हुए कहा कि भाषा और शिल्प के बोझ से ग्रस्त वर्तमान दौर में शिवमूर्ति को पढ़ना पाठकों को भरोसा देता है। कवि-लेखक सी.बी. भारती ने कहा कि शिवमूर्ति के लेखन में जीवन की स्थितियों को गहराई और सटीकता से पकड़ने की विलक्षण क्षमता दिखाई देती है।

आयोजक कवि आशाराम जागरथ ने उपन्यास के अंत में आए राजनीतिक वक्तव्यों का उल्लेख करते हुए इसे वैचारिक प्रतिबद्धता की कसौटी पर खरा बताया और लोकजीवन व लोकभाषा के सशक्त प्रयोग को रेखांकित किया। सत्यभान सिंह जनवादी ने शिवमूर्ति के लेखन में जन आंदोलनों और विद्रोह की उपस्थिति को महत्वपूर्ण बताया, जबकि शायर मुज़म्मिल फ़िदा ने उपन्यास की शैली को अत्यंत रोचक और प्रभावशाली कहा।

गोष्ठी में विंध्यमणि, कृष्णप्रताप सिंह, डॉ. अनिल सिंह, राम सनेही यादव, वेदिक द्विवेदी, सत्यभान सिंह जनवादी, ऋषिक द्विवेदी, कीर्ति यादव, दीप्ति यादव ज्योति, राकेश यादव, सुकन्या मैती, गौरी तिवारी सहित अनेक कवि, लेखक और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

Rishik Dwivedi
Rishik Dwivedi
Founder Member & Sub- Editor of NTF
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