Homeपूर्वांचालअयोध्याकाकोरी केस के महानायक शहीद ठाकुर रोशन सिंह की बलिदान पूर्व संध्या...

काकोरी केस के महानायक शहीद ठाकुर रोशन सिंह की बलिदान पूर्व संध्या पर दी गई मशाल सलामी

काकोरी कांड के महानायक अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की बलिदान पूर्व संध्या पर प्रयागराज में शहादत को समर्पित स्वर एक बार फिर मुखर हुए। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा अमर शहीद राजेंद्रनाथ लाहिड़ी के बलिदान दिवस 17 दिसंबर से अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान दिवस तक ‘शहादत से शहादत तक’ शीर्षक से आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम के तहत शहर में विचार–विमर्श और मशाल जुलूस का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम के द्वितीय दिवस 18 दिसंबर को अपराह्न तीन बजे अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान स्थल, पूर्व मलाका जेल परिसर स्थित एस.आर.एन. चिकित्सालय में विचार–विमर्श सत्र आयोजित हुआ। इसके उपरांत प्रतिभागियों ने अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क तक मशाल जुलूस निकालकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। मशाल सलामी क्रांतिकारी वंशज उत्तम कुमार बनर्जी के नेतृत्व में दी गई।

विचार–विमर्श सत्र में वक्ताओं ने दो प्रमुख मांगों को लेकर सरकार का ध्यान आकृष्ट किया। पहली, एस.आर.एन. चिकित्सालय का नामकरण अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर किया जाए, क्योंकि यही वह स्थल है जहां मलाका जेल में उन्हें फांसी दी गई थी। दूसरी, अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में लगाए गए प्रवेश शुल्क को तत्काल समाप्त किया जाए।

महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक एवं भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के विद्वान डॉ. शाह आलम राणा सहित अन्य वक्ताओं ने कहा कि प्रयागराज वह भूमि है, जहां देश के महान क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी। ऐसे में शहादत स्थलों पर प्रवेश शुल्क वसूला जाना शहीदों के सम्मान के विपरीत है। विशेष रूप से छोटे स्कूली बच्चों से शुल्क लेना जनभावनाओं को आहत करता है। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि पार्क के रखरखाव हेतु व्यवस्था हो सकती है, किंतु शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा, प्रांगण और शहादत स्थल तक पहुंच को सशुल्क करना अनुचित है।

वक्ताओं ने ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज़ाद की शहादत के बाद जिस जामुन के पेड़ के पास उन्होंने बलिदान दिया, वह जनता के लिए प्रेरणा का केंद्र बन गया था। अंग्रेजी हुकूमत ने उस चेतना को समाप्त करने के लिए पेड़ को कटवाया और जड़ों तक जलवा दिया, लेकिन विचारों को नहीं मिटा सकी। वक्ताओं ने सवाल उठाया कि क्या आज़ाद भारत में प्रवेश शुल्क लगाकर वही इतिहास दोहराया जा रहा है?

कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि वर्षों से आज़ाद पार्क में लगने वाले मेले और स्मृतियां नई पीढ़ी को शहीदों से जोड़ने का माध्यम रही हैं। यदि ऐसे स्थलों पर शुल्क के जरिए आमजन की पहुंच सीमित की गई, तो यह राष्ट्र की ऐतिहासिक विरासत के लिए घातक होगा।

ठाकुर रोशन सिंह के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए वक्ताओं ने कहा कि उनका नाम और विचार दोनों ही देश की नई पीढ़ी के लिए प्रकाश स्तंभ हैं। फांसी से पूर्व मलाका जेल में लिखे गए उनके पत्र आज भी महुआ डाबर संग्रहालय में सुरक्षित हैं और उनके क्रांतिकारी चिंतन की सजीव गवाही देते हैं। 19 दिसंबर 1927 को उनकी शहादत के दिन उमड़े जनसैलाब और ऐतिहासिक अंतिम यात्रा के चित्र आज भी उस जनभावना को रेखांकित करते हैं।

वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि आज़ादी के अमृत काल में एस.आर.एन. चिकित्सालय का नामकरण अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर किया जाना उनके बलिदान का सच्चा सम्मान होगा और आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

Rishik Dwivedi
Rishik Dwivedi
Founder Member & Sub- Editor of NTF
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -spot_img

Most Popular

Recent Comments