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दीपावली पर लॉन्च हुई वेदिक द्विवेदी की बहुचर्चित उपन्यास ‘छात्रसंघ’, कॉलेज से संसद तक की राजनीतिक यात्रा का चित्रण

दीपावली पर लॉन्च हुई वेदिक द्विवेदी की बहुचर्चित उपन्यास ‘छात्रसंघ’, कॉलेज से संसद तक की राजनीतिक यात्रा का चित्रण

लखनऊ /नई दिल्ली।
दीपावली के पावन अवसर पर पत्रकार और लेखक वेदिक द्विवेदी की दूसरी बहुप्रतीक्षित उपन्यास ‘छात्रसंघ’ का विमोचन फ्लिपकार्ट पर हुआ। जैसे ही यह पुस्तक ऑनलाइन आई, राजनीतिक और साहित्यिक हलकों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। पूर्वांचल की मिट्टी, बस्ती मंडल की राजनीति और छात्र जीवन की उथल-पुथल से बुनी यह कहानी न केवल एक छात्रनेता के संघर्ष को दर्शाती है, बल्कि यह बताती है कि कैसे विश्वविद्यालयों के गलियारे देश की संसद तक की राजनीति को प्रभावित करते हैं।

क्या है ‘छात्रसंघ’ की खासियत?

उपन्यास ‘छात्रसंघ’ को लेकर जो सबसे बड़ी बात सामने आई है, वह है इसके मुख्य किरदार की कहानी का मिलान पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष आदित्य नारायण तिवारी “कबीर” से होना। हालांकि लेखक वेदिक द्विवेदी ने किसी भी प्रत्यक्ष प्रेरणा की पुष्टि नहीं की है, परंतु यह अटकलें तेज़ हैं कि उपन्यास की आत्मा कबीर तिवारी के संघर्ष, वैचारिक प्रतिबद्धता और राजनीतिक सफर को छूती है।

कबीर तिवारी की बहन और सामाजिक कार्यकर्ता रंजना तिवारी ने भी इस उपन्यास के विमोचन पर शुभकामनाएं दीं और एक पोस्ट में कबीर का उल्लेख करते हुए लिखा, “कुछ कहानियां काग़ज़ पर जन्म नहीं लेतीं, वो ज़मीन पर लड़ी जाती हैं। ‘छात्रसंघ’ शायद उन्हीं में से एक है।” इसके बाद से यह चर्चा और तेज़ हो गई कि यह उपन्यास कहीं न कहीं कबीर तिवारी की विचारधारा और संघर्षों से प्रेरित है।

फिल्म अभिनेता अनूप सोनी की प्रतिक्रिया

इस किताब को लेकर मशहूर अभिनेता और क्राइम शोज़ से घर-घर में प्रसिद्ध अनूप सोनी ने एक प्रेरक टिप्पणी करते हुए कहा, “एक ऐसी दुनिया में आपका स्वागत है जहां कॉलेज के गलियारे से देश के सत्ता के गलियारे तक की यात्रा शुरू होती है।”

उनकी यह प्रतिक्रिया न केवल उपन्यास की गहराई को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि एक पूरे राजनीतिक तंत्र की बुनियाद समझने का माध्यम है।


छात्रसंघ: लोकतंत्र की नर्सरी

भारत में छात्रसंघ सिर्फ एक शैक्षणिक संस्था का हिस्सा नहीं होता, बल्कि यह लोकतंत्र की पहली सीढ़ी मानी जाती है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU), इलाहाबाद विश्वविद्यालय, और गोरखपुर विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में छात्र राजनीति का एक गहरा इतिहास रहा है। कई दिग्गज नेता, जैसे लालू प्रसाद यादव, अरुण जेटली, स्मृति ईरानी, योगी आदित्यनाथ आदि का सफर छात्रसंघ से शुरू हुआ।

छात्रसंघ युवाओं में नेतृत्व के गुण विकसित करता है, विचारधाराओं की टकराहट और संवाद के माध्यम से एक परिपक्व राजनीतिक समझ पैदा करता है। इस लिहाज से, ‘छात्रसंघ’ उपन्यास न केवल एक रोचक कथा है, बल्कि एक वैचारिक दस्तावेज़ भी है।


पूर्वांचल की आत्मा और ज़मीनी राजनीति

पूर्वांचल के बस्ती मंडल की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण, भाषाई रंग और राजनीतिक ताने-बाने को जिस बारीकी से ‘छात्रसंघ’ में पिरोया गया है, वह इस क्षेत्र से जुड़े पाठकों को खासा आकर्षित कर रहा है। उपन्यास में युवा आक्रोश, शैक्षणिक राजनीति, जातिवाद, और सत्ता संघर्ष के साथ-साथ व्यक्तिगत रिश्तों की भी परतें खुलती हैं।

यह किताब उन लोगों के लिए भी खास है जो राजनीति को केवल टीवी डिबेट्स या संसद में बैठे नेताओं के चश्मे से देखते हैं। ‘छात्रसंघ’ बताता है कि असली राजनीति कैसे बनती है — चाय की दुकानों पर बहसों से लेकर हॉस्टल की मीटिंग्स तक, और कक्षा से लेकर वोटिंग बूथ तक।


किताब क्यों पढ़ें?

यह उपन्यास युवा वर्ग को राजनीतिक चेतना के प्रति जागरूक करता है।

भारत की जमीनी राजनीति और उसके जटिल पक्षों को सरल भाषा में सामने लाता है।

पूर्वांचल की संस्कृति, भाषा और सामाजिक ताने-बाने का जीवंत चित्रण करता है।

एक प्रेरक और विचारोत्तेजक कथा जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है।


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वेदिक द्विवेदी की ‘छात्रसंघ’ एक ऐसी कृति बनकर उभर रही है जो साहित्य और राजनीति के बीच की खाई को पाटती है। यह सिर्फ एक उपन्यास नहीं, बल्कि युवा भारत की आवाज़ है — वह आवाज़ जो नारे लगाती है, संघर्ष करती है, हारती है, उठती है और अंततः नेतृत्व करती है।

दीपावली के दिन इस पुस्तक का विमोचन भी प्रतीकात्मक है — नई रोशनी, नया विचार, और एक नई दिशा की शुरुआत।

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