मेरा घर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बसा हुआ है। बचपन से ही यह राजमार्ग मेरी आँखों के सामने केवल कंक्रीट और डामर की सड़क नहीं रहा, बल्कि एक जीवंत धारा की तरह रहा। सुबह होते ही गाड़ियों की आवाज़ से घर गूंज उठता। यात्री टेम्पो में चढ़ते, जीपों में बैठते, और कभी-कभी बसों में भीड़ लग जाती। मेरे बचपन का सबसे बड़ा रोमांच इन गाड़ियों को आते-जाते देखना ही था। यह दृश्य केवल यातायात का नहीं बल्कि उस दौर की अर्थव्यवस्था और समाज की धड़कन भी था। 90 के दशक में सबसे लोकप्रिय तीन-पहियों वाली टेम्पो थी। इसका असली नाम हेनसेट टेम्पो था, जिसे जर्मनी की कंपनी ने विकसित किया और भारत में बजाज ने उत्पादन शुरू किया। आम लोग इसे “सूंड़ वाली गाड़ी”, “कौआ गाड़ी” या “गणेशजी” कहते थे। ये टेम्पो और जीप गाँव और कस्बों के बीच आवाजाही आसान बनाते। छोटे किसान अपना अनाज, व्यापारी अपना सामान, और यात्री अपने शहर तक का सफर इन्हीं से करते। इंजन साधारण, देखभाल आसान और डीज़ल पर अर्थव्यवस्था टिकती थी। यहीं से बचपन में एक बड़ा सबक मिला। जब डीज़ल महँगा होता, अगले ही दिन किराया बढ़ जाता; जब दाम घटता, तब भी किराया जस का तस रहता। यही खाई थी—सरकारी घोषणा और जनता तक पहुँची वास्तविकता के बीच।
आज जब जीएसटी सुधारों की चर्चा सुनता हूँ, वही टेम्पो-जीप की यादें ताज़ा हो जाती हैं। सरकार ने कर प्रणाली को सरल बनाने के लिए चार स्लैब घटाकर दो प्रमुख दरों (5% और 18%) कर दी हैं, आवश्यक वस्तुएँ शून्य प्रतिशत और लक्ज़री/हानिकारक वस्तुएँ 40 प्रतिशत में अलग से रखी गई हैं। कागज़ पर कदम साहसिक है, कारोबारियों और उपभोक्ताओं के लिए आसान। लेकिन सवाल वही है—क्या राहत जनता तक पहुँचेगी?
सरकार ने कॉपियों और किताबों पर 5% टैक्स तय किया, संदेश दिया कि शिक्षा का बोझ हल्का होगा। लेकिन कागज़, उत्पादन का मुख्य आधार, अब 12% के स्लैब से निकलकर 18% में है। उत्पादन लागत बढ़ी, कीमत जस की तस। जैसे कभी डीज़ल का दाम घटने के बाद भी टेम्पो का किराया जस का तस रहता था, वैसे ही अब कॉपी की कीमतें नहीं घटेगी। नीति और नीयत अच्छी हो सकती हैं, लेकिन ज़मीनी असर तभी होगा जब हर स्तर पर संतुलन हो। यदि कच्चे माल पर ज्यादा टैक्स और तैयार माल पर कम, तो इसे इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर कहते हैं। इससे छोटे उद्योग और एमएसएमई सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। पहले स्वास्थ्य और जीवन बीमा प्रीमियम पर 18% जीएसटी वसूला जाता था। यदि कोई 10,000 रुपये देता, तो 1,800 रुपये टैक्स चुकाने पड़ते। हाल ही में इसे हटा दिया गया। सतही राहत दिखती है, लेकिन कंपनियों के इनपुट टैक्स क्रेडिट खत्म होने से प्रीमियम बढ़ने की आशंका है। जैसे टेम्पो-जीप का किराया घटता नहीं था, वैसे ही अब बीमा प्रीमियम में भी जनता को सीधे राहत नहीं मिल रही। मीडिया रिपोर्ट्स दिखाते हैं कि ऑटो डीलर्स वित्तीय दबाव में हैं, टेक्सटाइल उद्योग और एफएमसीजी कंपनियाँ पुराने स्टॉक की लागत बढ़ने जैसी चुनौतियों से जूझ रही हैं। कंपनियाँ नए स्लैब को समायोजित कर रही हैं, लेकिन इसका लाभ उपभोक्ताओं तक पहुँच रहा है या नहीं, यह सवाल खड़ा है। जैसे टेम्पो-जीप ने गाँव और शहर के बीच आवाजाही आसान की थी, वैसे ही अब इन सुधारों का असर उपभोक्ताओं तक पहुँचना चाहिए था, लेकिन लाभ अब भी सीमित है। टेम्पो-जीप वाली यादों का संदेश आज भी प्रासंगिक है। नीति और घोषणा भले ही बेहतरीन हों, असली राहत तभी होती है जब जनता के जेब पर असर दिखे। यह केवल आंकड़ों या प्रेस कॉन्फ्रेंस से मापा नहीं जा सकता। सरकार की मंशा पर सवाल नहीं है, लेकिन क्रियान्वयन की ईमानदारी ही असली कसौटी है। नीति को ज़मीन तक पहुँचाने के लिए निगरानी, संतुलन और व्यवहारिक समझ जरूरी है। यह सुनिश्चित करना होगा कि कंपनियाँ टैक्स छूट का लाभ सीधे ग्राहकों तक पहुँचाएँ, न कि केवल अपने मुनाफ़े या वित्तीय लचीलापन के लिए इस्तेमाल करें। सरकार से अपील है कि वह केवल नीति बनाने तक सीमित न रहे। इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर खत्म करें, कंपनियों पर निगरानी रखें, और उपभोक्ता तक वास्तविक राहत पहुँचाने की गारंटी दें। तभी नीतियाँ केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस का हिस्सा न रहकर जनता के जीवन में बदलाव बनेंगी।
फिलहाल स्थिति यह है कि सुधारों का राजनीतिक श्रेय सरकार को और वित्तीय लाभ कंपनियों, बिचौलियों व डीलरों को मिल रहा है। आम उपभोक्ता अब भी उसी हाल में है—जैसे कभी डीज़ल सस्ता होने पर टेम्पो-जीप का किराया नहीं घटा। सवारी अब भी पूरा किराया चुका रही है, राहत सिर्फ़ घोषणा में दर्ज है। असली सुधार तब होगा जब घोषणा से ज़्यादा असर जनता की जेब में दिखेगा। इस पूरी प्रक्रिया में स्पष्ट होता है कि नीति और नीयत के बीच वास्तविक असर का फासला अभी भी बरकरार है। चाहे शिक्षा हो, बीमा हो, ऑटोमोबाइल या एफएमसीजी, जनता वही अनुभव कर रही है—घोषणा तो होती है, लेकिन वास्तविक राहत सीमित या नगण्य रहती है।
यही वह सीख है जो टेम्पो और जीप ने मुझे बचपन में दी थी। ऊपर से कितना भी एलान हो, असली राहत तब होती है जब जमीन पर किराया घटे, कीमतें कम हों, और नीति का असर सीधे आम आदमी तक पहुंचे। यदि जीएसटी सुधार का लाभ केवल घोषणा और आंकड़ों तक सीमित रह गया, तो यह केवल शब्दों की राहत भर होगी, वास्तविक नहीं।
- – ✍️अखिल कुमार यादव

