वाराणसी। “व्यास और वाल्मीकि के पश्चात् कालिदास सबसे उत्तरजीवी कवि हैं। इनको कवि कुलगुरु, विश्वगुरु कहा गया। रवींद्रनाथ टैगोर को छोड़कर किसी को भी कवि कुलगुरु नहीं कहा गया। कवि के बाद उससे प्रभाव ग्रहण करने की प्रक्रिया को उत्तरजीविता कह सकते हैं। कालिदास पर जितने काव्य, खंडकाव्य, नाटक लिखे गए उनको आधार बनाकर और किसी पर शायद ही इतना लिखा गया हो। प्राचीन साहित्य में अपवाद हैं शंकराचार्य और आधुनिक साहित्य में गाँधी।”
ये बातें प्राच्य भाषा संस्कृत को आधुनिकता का संस्कार देने वाले प्रो. राधा वल्लभ त्रिपाठी ने बीएचयू में कहीं। वे सामाजिक विज्ञान संकाय, महिला एवं विकास अध्ययन केन्द्र बीएचयू और भोजपुरी अध्ययन केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘कालिदास का सांस्कृतिक भूगोल’ विषयक संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए बोल रहे थे।

उद्घाटन सत्र
संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र दो उपविषयों में विभक्त था। ‘कालिदास की उत्तरजीविता’ विषय पर संस्कृत के विद्वान प्रो. राधा वल्लभ त्रिपाठी और ‘कालिदास के साहित्य में स्त्री’ विषय पर प्रसिद्ध कवयित्री प्रो. अनामिका ने अपना वक्तव्य दिया। इस अवसर पर संस्कृतकर्मी प्रो. अवधेश प्रधान द्वारा मेघदूत के भोजपुरी अनुवादित पुस्तक का लोकार्पण किया गया।
प्रो. राधा वल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि व्यास और वाल्मीकि के पश्चात् कालिदास सबसे उत्तरजीवी कवि हैं। व्यास और वाल्मीकि पर जितनी प्रशस्तियाँ नहीं लिखी गईं उतनी कालिदास पर लिखी गईं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तरजीविता को समझाने के लिए वे तुलसीदास, रवींद्रनाथ टैगोर और जयशंकर प्रसाद का उदाहरण लेंगे। तुलसी और कालिदास की वंदना में साम्य बताते हुए उन्होंने कहा कि चेतना और भाषा का अंतर्सम्बन्ध हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा में पहले से ही है।
उन्होंने तुलसी, प्रसाद और टैगोर की कृतियों में कालिदास के प्रभाव को रेखांकित किया। रवींद्रनाथ ने कालिदास पर लगभग दो सौ कविताएँ लिखीं और मेघदूत पर विशेष रूप से कई रचनाएँ कीं। काजी नजरूल इस्लाम तक ने कहा था कि “कालिदास भारत के नहीं बल्कि बांग्लादेश के राष्ट्रीय कवि हैं।” प्रसाद ने भी कालिदास से संवाद किया। उजड़ी अयोध्या और रघुवंश के प्रसंगों में कालिदास से प्रेरणा ली।

प्रो. अनामिका का वक्तव्य
साहित्य अकादमी सम्मान से पुरस्कृत कवयित्री प्रो. अनामिका ने कालिदास के विक्रमउर्वशियम् नाटक में चित्रलेखा और उर्वशी के सहेली भाव की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि कालिदास के नायक उदात्त हैं और उनके काव्य में दाम्पत्य के कई अनूठे चित्र मिलते हैं। स्त्री-पुरुष का मिलन परामानस तक पहुंचने की सीढ़ी है। उन्होंने कहा कि कालिदास की रचना में प्रेम को संयमित और व्यक्तित्व को निर्मल बनाने का भाव है।

अध्यक्षीय उद्बोधन
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता सामाजिक विज्ञान संकाय प्रमुख प्रो. बिंदा परांजपे ने की। उन्होंने कहा कि कालिदास जब सामान्य अनुभव को अपने साहित्य में चित्रित करते हैं, तब वह सामान्य नहीं रह जाता। संचालन प्रो. अर्पिता चटर्जी और स्वागत वक्तव्य प्रो. प्रभाकर सिंह ने दिया।
प्रथम सत्र में भोजपुरी अनुवाद का पाठ एवं अनुवादक प्रो. अवधेश प्रधान का वक्तव्य रहा। उन्होंने कहा कि संस्कृत के प्रत्येक शब्द की इतनी अर्थ-छायाएं होती हैं कि कोई दूसरी भाषा उसका पूरा प्रतिशब्द नहीं दे सकती। उन्होंने हवलादर त्रिपाठी सहृदय, पंडित राजेंद्र मिश्र और अन्य अनुवादकों के योगदान का उल्लेख किया। सत्र की अध्यक्षता विख्यात कवि अष्टभुजा शुक्ल ने की।

इस सत्र में प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि कालिदास के नाटकों और काव्यों में वंचित समाज का भी चित्रण है। अभिज्ञानशाकुन्तलम् में मछुआरे के गीत और अन्य प्रसंग इसकी पुष्टि करते हैं। सत्र का संयोजन डॉ. प्रियंका सोनकर ने किया।
कविता पाठ और समापन
चतुर्थ सत्र में कविता पाठ हुआ जिसकी अध्यक्षता प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी ने की। इस अवसर पर प्रो. अनामिका, अष्टभुजा शुक्ल, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी समेत अन्य कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया।
संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में प्रो. वशिष्ठ अनूप, प्रो. सदानंद शाही, प्रो. बलिराज पाण्डेय, प्रो. घनश्याम, डॉ. दीनबंधु तिवारी, प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी, प्रो. पद्मप्रिया, प्रो. नीरज खरे, प्रो. सरफराज़ आलम, प्रो. मनोज सिंह, प्रो. मालविका रंजन, डॉ. मीनाक्षी झा, डॉ. प्रियंका झा, डॉ. प्रमोद बागडे, श्री शिव कुमार पराग, डॉ. रामाज्ञा शशिधर, डॉ. प्रशांत ठाकुर, डॉ. किंगसन सिंह, डॉ. विवेक सिंह, डॉ. प्रभात मिश्र, डॉ. प्रीति त्रिपाठी, डॉ. सत्य प्रकाश सिंह समेत बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शोधार्थी उपस्थित रहे।

