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15 अगस्त: महुआ डाबर की सुनाई न देने वाली कहानी — आज़ादी के साथ जागता हुआ इतिहास

डॉ. कल्पना राजपूत

देश के स्वतंत्रता संग्राम के अनगिनत संघर्षों में से एक सबसे दर्दनाक और बड़ी क्रूरता ब्रिटिश राज के दौरान महुआ डाबर (उत्तर प्रदेश के बस्ती क्षेत्र) में हुई। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 3 जुलाई महुआ डाबर में ब्रिटिश फौज ने एक बर्बर नरसंहार किया, जिसे बाद में इतिहास से मिटाने की पूरी कोशिश की गई। उस समय लगभग 5,000 लोग यहाँ रहते थे। ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्षरत विद्रोहियों के आश्रय के कारण इस गाँव को निशाना बनाया गया। ब्रिटिश फौज ने गाँव को घेरकर आग के हवाले कर दिया और जो कोई भी भागने की कोशिश करता, उसे गोली मार दी गई। इस नरसंहार में न तो कोई बूढ़ा बख़्शा गया, न बच्चे। पूरा गाँव खाक हो गया। लेकिन महुआ डाबर की यह कहानी इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हुई। जालियांवाला बाग जैसे कांड को जहां यादगार बनाया गया, वहीं महुआ डाबर को इतिहास की किताबों से मिटा दिया गया। ब्रिटिशों ने ज़मीन के दस्तावेज़ बदले, नक्शे में नाम हटाया और गाँव को “ग़ैर-चिरागी” यानी “अस्तित्वहीन” घोषित कर दिया। इस कहानी को केवल पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से याद रखा गया।
यह कोई आकस्मिक हिंसा नहीं थी, बल्कि साम्राज्य की योजनाबद्ध आतंकवाद था। महुआ डाबर के निवासियों ने ब्रिटिश सत्ता का विरोध किया था, जिसके बाद कई अंग्रेज पुलिसकर्मी मारे गए थे। ब्रिटिश अधिकारियों ने कठोर सजा के रूप में इस गाँव को पूरी तरह तबाह कर दिया और बाद में उसी नाम का एक नया गाँव 50 मील दूर बनाकर इतिहास को भ्रमित करने की कोशिश की। 2010 में लखनऊ विश्वविद्यालय के पुरातत्वविदों ने यहाँ खुदाई कर महुआ डाबर के उस इतिहास को पुनः जीवित किया। जल चुके बरसाती बर्तन, विकसित जल निकासी व्यवस्था और जलती हुई मानव हड्डियों के अवशेषों ने यह साबित किया कि यह गाँव कभी समृद्ध और विकसित था।


डॉ. शाह आलम राना, जो खुद इस नरसंहार के जीवित परिवार से हैं, ने 1999 में महुआ डाबर संग्रहालय की स्थापना की। उनका कहना है, “यह केवल अतीत की बात नहीं, यह उस ऐतिहासिक भूल को सुधारने की लड़ाई है, जिसे ब्रिटिश और स्वतंत्र भारत दोनों ने दबा दिया।” हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने 2022 में इसे स्वतंत्रता संग्राम के पर्यटन स्थल के रूप में मान्यता दी, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक राष्ट्रीय स्मारक नहीं बनाया है और ब्रिटिशों से माफी की मांग भी नहीं की है। यह अंतर जालियांवाला बाग से तुलना में साफ नजर आता है, जहां ब्रिटिश शासकों ने माफी मांगी।
महुआ डाबर की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि इतिहास के कौन से हिस्से याद रखे जाते हैं और कौन भुला दिए जाते हैं। स्वतंत्र भारत के 79वें स्वतंत्रता दिवस पर, महुआ डाबर की राख हमें यह याद दिलाती है कि साम्राज्य ने केवल लोगों को नहीं मारा, बल्कि उनकी यादों को भी मिटाने की कोशिश की।
जैसे कि बस्ती के लोकगीत कहते हैं –
“उस रात आग इतनी भड़की कि मनोहरा नदी तक रो पड़ी।”
वो नदी भी उन यादों को समेटे हुए है, जिन्हें इतिहास भूलना चाहता था।

डॉ. कल्पना राजपूत वर्तमान में ज्योति मिशन विद्यापीठ में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं एवं इंटीग्रल रिसर्च पत्रिका का संपादन करती हैं।

Rishik Dwivedi
Rishik Dwivedi
Founder Member & Sub- Editor of NTF
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