जब फेसबुक और मैसेंजर जैसे प्लेटफॉर्म पर हिंदी और उर्दू के कई बड़े शायर और कविगण महिलाओं से आपत्तिजनक बातें किया करते थे, यहां तक कि उनसे न्यूड फोटो की मांग तक कर बैठते थे — तब अगर कोई इसके खिलाफ आवाज उठाता था, तो खुद उसे ही विरोध का सामना करना पड़ता था। लेकिन आज जब यह सब कुछ सोशल मीडिया पर खुलेआम होता दिख रहा है, तब कई लोग चुप हैं, और चुप्पी खतरनाक संकेत दे रही है।
हाल ही में पटना के एक कवि सम्मेलन में एक वरिष्ठ कवि द्वारा एक युवती के साथ की गई अभद्रता ने यह साबित कर दिया कि साहित्य का यह मंच अब ‘संवेदनशील’ नहीं, बल्कि ‘संदिग्ध’ हो चला है। आयोजकों ने कवि को मंच से बाहर जरूर कर दिया, लेकिन साहित्य जगत के तथाकथित बड़े नाम इस कुकृत्य पर चुप ही रहे। इससे भी ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब महिला लेखिकाओं और कवयित्रियों की तरफ से भी कोई खास प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। केवल लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने संभवतः इसपर अपनी बात कही।
यहां तक कि कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र में कार्यरत अधिकांश पुरुष साहित्यकार चरित्रहीनता की हदें पार कर चुके हैं। नारीवाद पर कविताएं और महाकाव्य लिखने वाले कवियों की असल सोच और आचरण में इतना फर्क है कि आज उन पर भरोसा करना मुश्किल हो चला है। जो मुक्तक लिखते हैं, वही ‘मुक्त भेड़ियों’ जैसे व्यवहार करते नजर आते हैं। और जो छंद में रचनाएं करते हैं, वे असल में ‘छल’ के पर्याय बनते जा रहे हैं।
कुमार विश्वास जैसे बड़े नाम, जो अब कुछ वर्षों से मंच से दूरी बनाए हुए हैं, उनके बारे में भी जब लेखक इस क्षेत्र में सक्रिय था तो यह सुनने को मिला कि उन्हें अलग-अलग महिलाओं से बातचीत और मेल-मुलाकात का एक प्रकार का ‘नशा’ था। फिर भी लोग ऐसे व्यक्तियों को आदर्श मानते हैं, यह समझ से परे है।
उर्दू का सबसे बड़ा फेस्टिवल जो दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में होता है — वहां अब टिकट लगती है। लेखक एक बार वहां एक महिला मित्र को एक नामी शायर से मिलवाने ले गया। मिलवाने के बाद जब बाहर आया तो महिला मित्र ने जो बताया, वह चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि उस शायर ने जिस तरह से उन्हें देखा, उससे उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो शरीर का पूरा स्कैन हो गया हो। यही शायर आज सोशल मीडिया पर लाखों-करोड़ों फॉलोअर्स के साथ जनता के बीच प्रसिद्ध है।
लेखक का यह भी मानना है कि साहित्य जगत में अब महिलाओं के लिए न तो कोई सुरक्षित माहौल बचा है और न ही आत्मसम्मान की गारंटी। पैसा पहले से ही बेहद कम है, और अब इज्जत भी जाती दिख रही है। ऐसे में किसी महिला को इस फील्ड में जाने की सलाह देना खुद में खतरा पैदा करने जैसा होगा।
लेखक यह स्पष्ट करता है कि ये उसके व्यक्तिगत अनुभव और विचार हैं, जिन्हें वह किसी पर थोपना नहीं चाहता। पर यह लेख उन स्याह पहलुओं को जरूर सामने लाता है, जो अक्सर साहित्य की चमक में छिप जाते हैं।
नोट: यह लेख किसी संस्था या व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है, बल्कि एक व्यापक सामाजिक विमर्श को शुरू करने का प्रयास है। यदि आप इस विषय पर प्रतिक्रिया देना चाहें, तो स्वतंत्र रूप से अपनी बात रख सकते हैं।

