भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि हल्के मोटर वाहन (LMV) का ड्राइविंग लाइसेंस रखने वाले व्यक्ति को 7,500 किलोग्राम तक के अनलेडन वजन वाले ट्रांसपोर्ट वाहन चलाने की अनुमति है। इस फैसले से बीमा कंपनियों के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं, क्योंकि पहले ऐसे मामलों में जहां LMV लाइसेंसधारी चालक ट्रांसपोर्ट वाहन चला रहे होते थे, बीमा कंपनियां दावा खारिज कर देती थीं।
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस महत्वपूर्ण निर्णय को सुनाया। न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय, जिन्होंने यह फैसले का मसौदा तैयार किया, ने कहा कि ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जो यह साबित करे कि LMV लाइसेंसधारी अधिक दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि LMV लाइसेंसधारी, जो सबसे अधिक समय सड़क पर बिताते हैं, के पास कुछ वैध शिकायतें हैं जिन्हें तकनीकी आधार पर नकारा नहीं किया जा सकता।
इस फैसले के बाद, बीमा कंपनियों को अब अपने तरीके बदलने होंगे, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि LMV लाइसेंसधारी कानूनी रूप से 7,500 किलोग्राम तक के ट्रांसपोर्ट वाहन चला सकते हैं। इससे पहले, जब ऐसी दुर्घटनाओं में दावा किया जाता था, तो बीमा कंपनियां यह तर्क देती थीं कि इन ड्राइवरों के पास उपयुक्त लाइसेंस नहीं था, जिससे कई बार दावे खारिज कर दिए गए थे।
इस मामले में, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरामणी ने अदालत को बताया कि मोटर वाहन (MV) अधिनियम, 1988 में संशोधन की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है। अदालत ने केंद्र से जल्द इस संशोधन को लागू करने की अपील की, ताकि सड़क पर ड्राइविंग के लिए कानूनी दायित्व और बीमा दावों के मामले में कोई असमंजस न रहे।
इस फैसले से न केवल बीमा कंपनियों को अपनी नीतियों को फिर से परिभाषित करना पड़ेगा, बल्कि यह ड्राइवरों के अधिकारों को भी सही मायने में मान्यता देगा। अब वे आसानी से अपने वाहनों का संचालन कर सकेंगे और दुर्घटना होने पर उनके दावे भी बीमा कंपनियां बिना किसी कानूनी रुकावट के मंजूर करेंगी।
यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला सड़क परिवहन क्षेत्र में बदलाव की ओर एक अहम कदम साबित हो सकता है, क्योंकि इससे बीमा प्रक्रियाओं और नियमों में पारदर्शिता आएगी।

