बस्ती, 16 अक्टूबर: प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों को बंद कर छात्रों व शिक्षकों का अन्यत्र समायोजन करने की सरकार की योजना ने मिड डे मील रसोइया कर्मचारी यूनियन को सड़कों पर ला दिया है। यूनियन ने सरकार की नीतियों को लेकर तीखा विरोध जताते हुए कहा कि रसोइयों का भी समायोजन जरूरी है, क्योंकि यह कदम उनके अस्तित्व पर सीधा हमला है। सरकार द्वारा स्कूलों में छात्र संख्या कम होने का बहाना बना कर स्कूल बंद किए जा रहे हैं, जिससे गरीब छात्रों और कर्मचारियों के भविष्य पर खतरा मंडरा रहा है।
मासिक वेतन 26000 रुपये और 12 महीने की नौकरी की मांग
हर्रैया तहसील पर आयोजित विरोध प्रदर्शन में यूनियन ने सरकार से नियमित तौर पर 26000 रुपये प्रतिमाह का वेतन देने और रसोइयों को साल भर काम देने की मांग उठाई। संगठन ने चंद्रावती केस में उच्च न्यायालय के फैसले को लागू करने की भी मांग की। प्रदर्शन में रसोइयों ने जुलूस निकालकर अपनी आवाज बुलंद की और उप जिलाधिकारी विनोद पांडेय के माध्यम से मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन सौंपा। प्रदर्शन में बस्ती, संत कबीर नगर और सिद्धार्थनगर जिलों के रसोइयों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
प्राथमिक शिक्षा के निजीकरण का विरोध
प्रदर्शन को संबोधित करते हुए जिला मंत्री ध्रुव चंद ने कहा, “सरकार प्राथमिक शिक्षा की जवाबदेही से हाथ खींच रही है, जो कि बेहद खतरनाक साबित होगी। प्राथमिक शिक्षा को निजी हाथों में सौंपना गरीब छात्रों के भविष्य के लिए घातक है। आर्थिक तंगी के कारण बड़ी संख्या में बच्चे शिक्षा से वंचित हो सकते हैं।” उन्होंने सरकार पर छात्र संख्या बढ़ाने के उपाय न करने का भी आरोप लगाया और कहा कि सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए कि छात्र संख्या घट क्यों रही है।

रसोइयों के साथ हो रहा अन्याय
प्रदर्शन में जिला उपाध्यक्ष राम निरख यादव ने कहा कि रसोइयों को बिना कारण बताओ नोटिस के नौकरी से हटाया जा रहा है, जो कि अन्यायपूर्ण है। उन्होंने कहा, “सरकार को 12 महीने का मानदेय नियमित रूप से देना चाहिए और अनावश्यक कार्यों में रसोइयों का इस्तेमाल बंद किया जाना चाहिए। रसोइयों को विद्यालय में केवल उनके काम तक सीमित रखा जाए, ताकि वे सम्मान से अपना जीवन यापन कर सकें।”
बढ़ते असंतोष की लहर
हर्रैया ब्लॉक परिसर से उप जिलाधिकारी कार्यालय तक निकले जुलूस में रसोइया कर्मचारियों का असंतोष साफ दिखाई दिया। रसोइया कर्मचारी जग राम गौड़, फूल चंद्र, रीता सिंह, प्रभावती और अन्य नेताओं ने इस मुद्दे पर जोर देते हुए कहा कि अगर सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो वे अपना आंदोलन और तेज करेंगे।
सरकार से सीधी अपील
प्रदर्शनकारियों ने यह साफ संदेश दिया कि अगर सरकार ने जल्द ही उनकी मांगों को नहीं माना, तो पूरे मंडल में विरोध की लहर और भी व्यापक रूप ले सकती है। रसोइया कर्मचारियों का यह संघर्ष सिर्फ उनके हक के लिए नहीं, बल्कि प्राथमिक शिक्षा के भविष्य को बचाने के लिए भी है।
क्या सरकार सुनेगी उनकी आवाज?
यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस विरोध को कितनी गंभीरता से लेती है और क्या कदम उठाती है। रसोइया कर्मचारी यूनियन का यह आंदोलन उन लाखों लोगों की आवाज है जो न्यूनतम वेतन, स्थायी रोजगार और शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

