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बस्ती में महिलाओं ने राशन की दुकान की मांग को लेकर कलक्ट्रेट में किया प्रदर्शन,जिलाधिकारी को सौंपा प्रार्थना पत्र

नेवरी गाड़ा कुसतौर की महिलाएं डीएम से राशन की दुकान आवंटन के लिए उठाई आवाज, चार किलोमीटर चलने की मजबूरी का किया जिक्र

बस्ती, 08 अक्टूबर : बहादुरपुर विकास खंड के नेवरी गाड़ा कुसतौर गांव की महिलाएं अब केवल अपने परिवारों का ही नहीं, बल्कि अपने अधिकारों का भी मजबूती से रक्षा करने का संकल्प ले चुकी हैं। इन महिलाओं ने कलक्ट्रेट पहुंचकर एकजुटता का एक अनूठा उदाहरण पेश किया, जब उन्होंने जिलाधिकारी को एक प्रार्थना पत्र सौंपा और अपने गांव में राशन की दुकान के आवंटन की मांग की।

महिलाओं ने बताया कि उन्हें राशन लेने के लिए चार किमी दूर जाना पड़ता है, जिससे न केवल समय बर्बाद होता है, बल्कि कई प्रकार की कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है। उनका कहना है कि गांव में सरकारी राशन की दुकान का लाइसेंस अनियमितताओं के कारण निरस्त कर दिया गया था, और अब यह दुकान चंदो से अटैच कर दी गई है। इस स्थिति में उन्हें दूर जाकर राशन की व्यवस्था करने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

7 अक्टूबर को पंचायत भवन में ग्राम प्रधान और विकास अधिकारी के साथ एक खुली बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें महिलाओं ने किरन देवी के नाम पर राशन की दुकान के आवंटन का अनुरोध किया। लेकिन ग्राम पंचायत अधिकारी ने बताया कि शासनादेश के अनुसार, कोटे की दुकान का आवंटन पहले वरीयता समूह के सदस्यों को दिया जाएगा। इस पर महिलाओं ने चिंता जताई कि गांव में ऐसा कोई सदस्य नहीं है, जो दुकान का संचालन कर सके।

महिलाओं ने उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंड पीठ के 24 मई 2021 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि इस आदेश के अनुपालन में ग्राम पंचायत में सरकारी राशन की दुकान का आवंटन आवश्यक है। उन्होंने डीएम से अनुरोध किया कि किरन देवी के पक्ष में राशन की दुकान का आवंटन किया जाए।

इस आंदोलन में सरिता, मंजू, सीमा, इंद्रमती, रीता देवी, लालती, इसलावती, पुष्पा, मीना देवी, लालती, शोभा, दुलारी, सोनमती जैसी अनेक महिलाएं शामिल रहीं। यह न केवल एक स्थानीय मुद्दा है, बल्कि यह महिलाओं के सशक्तिकरण और उनकी एकजुटता का प्रतीक भी है। उनकी यह मांग सिर्फ राशन की दुकान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके अधिकारों और स्वतंत्रता की एक मजबूत आवाज है, जो साबित करती है कि जब महिलाएं एकजुट होती हैं, तो वे किसी भी चुनौती का सामना कर सकती हैं।

क्या यह आंदोलन स्थानीय प्रशासन के कानों तक पहुंचेगा? या यह केवल एक आवाज बनेगा जो समय के साथ खो जाएगी? यही देखने की बात होगी!

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