भोपाल, मध्य प्रदेश – कांग्रेस नेता और पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े सहित पांच कांग्रेसी नेताओं को भोपाल की एमएलए कोर्ट ने दो-दो साल की जेल की सजा सुनाई है। न्यायाधीश स्वयं प्रकाश दुबे ने शनिवार को 2016 के एक पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए विपिन वानखेड़े, विवेक त्रिपाठी, आशुतोष चौकसे, आकाश चौहान और धनजी गिरी को दो वर्ष के कारावास और 11-11 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है।
मामले का विवरण:
- घटना का पृष्ठभूमि: 2016 में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने व्यापमं घोटाले की निष्पक्ष जांच और आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया था। इस दौरान प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों से झूमाझटकी और मारपीट करते हुए शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न की थी। इस दौरान पथराव भी किया गया था।
- प्रदर्शन के बाद: हबीबगंज थाना पुलिस ने प्रदर्शन के बाद कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की थी और विपिन वानखेड़े सहित पांचों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर विवेचना शुरू की थी। इसी मामले में कोर्ट ने पांचों आरोपितों को सजा सुनाई है।
- कोर्ट का फैसला: न्यायाधीश स्वयं प्रकाश दुबे ने विपिन वानखेड़े, विवेक त्रिपाठी, आशुतोष चौकसे, आकाश चौहान और धनजी गिरी को दो वर्ष के कारावास और 11-11 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है।
- नेताओं की प्रतिक्रिया:
- आशुतोष चौकसे: वर्तमान में एनएसयूआई प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष चौकसे ने कहा, “कोर्ट का सम्मान है, लेकिन फैसले से सहमत नहीं हैं। न्याय के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।”
- विपिन वानखेड़े: पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े ने कहा, “हम न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन ये आंदोलन उस समय का है जब प्रदेश में व्यापमं घोटाला हुआ था। जब तक युवाओं और जनता को हक नहीं मिलेगा, तब तक कांग्रेस के सिपाही के तौर पर लड़ाई लड़ते रहेंगे।”
- भविष्य की योजना: आशुतोष चौकसे ने आगे कहा, “मध्यप्रदेश में आए दिन घोटाले सामने आते हैं। 2016 में जब मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया था, तब हम व्यापमं घोटाले में छात्रों को न्याय दिलाना चाहते थे। आज जब कोर्ट ने हमें सजा सुनाई, तो अब नर्सिंग घोटाला सामने है। भाजपा सरकार छात्रों के साथ अन्याय कर रही है, और जो न्याय मांगने के लिए आंदोलन करते हैं उन्हें जेल में भेज रही है। हम सरकार से डरने वाले नहीं हैं, छात्र हित में न्याय के लिए लड़ते रहेंगे।”
भोपाल के इस मामले ने कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को न्यायालय के फैसले के बाद भी संघर्ष की राह पर बनाए रखा है। यह घटना कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक मतभेदों और घोटालों की जांच की मांग को लेकर चल रहे संघर्ष का एक और उदाहरण है।

