नई दिल्ली। भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन के अग्रदूत और सीटू (Centre of Indian Trade Unions) के संस्थापक अध्यक्ष कॉमरेड बी.टी. रणदिवे की 121वीं जयंती के अवसर पर, सीटू के 18वें अखिल भारतीय सम्मेलन की पूर्व संध्या पर उनके स्मृति को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। 19 दिसंबर 1904 को जन्मे कॉमरेड रणदिवे का जीवन मजदूर वर्ग की मुक्ति के संघर्ष का जीवंत प्रतीक रहा।
एम.ए. की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 1928 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और शीघ्र ही मुंबई में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) के एक सशक्त और प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे। गिरणी कामगार यूनियन के माध्यम से मुंबई के कपड़ा मजदूरों के संघर्षों को दिशा देने से लेकर 1946 में नौसेना रेटिंग्स विद्रोह के समर्थन में आयोजित ऐतिहासिक आम हड़ताल तक, उनके शुरुआती वर्ष औपनिवेशिक शासन और पूंजीवादी शोषण के खिलाफ सशक्त प्रतिरोध से भरे रहे।

1948 से 1950 के बीच अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव के रूप में उन्होंने तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष सहित कई क्रांतिकारी आंदोलनों के दौर में नेतृत्व किया। पार्टी के वामपंथी धड़े के प्रमुख नेता के रूप में वे 1964 के विभाजन के बाद सीपीआई(एम) के प्रमुख शिल्पकारों में शामिल रहे। एक सशक्त, संघर्षशील और राजनीतिक रूप से जागरूक ट्रेड यूनियन आंदोलन के उनके दृष्टिकोण का साकार रूप मई 1970 में कोलकाता में सामने आया, जब उन्हें सीटू का संस्थापक अध्यक्ष चुना गया।
अपने जीवन के अंतिम समय तक कॉमरेड रणदिवे ने सीटू का मार्गदर्शन करते हुए मजदूरों की राजनीतिक चेतना को ऊंचा उठाने और मजदूर-किसान एकता को मजबूत करने पर विशेष बल दिया। वे ऐसे विरले नेता थे जिन्होंने गहन मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत को अथक व्यावहारिक संघर्ष से जोड़ा। महिला समानता के प्रबल समर्थक और जाति व सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ आजीवन संघर्षरत कॉमरेड रणदिवे का जीवन सादगी, अनुशासन और निष्ठा का उदाहरण रहा। अपने क्रांतिकारी जीवन में उन्होंने नौ वर्ष कारावास और चार वर्ष भूमिगत रहकर बिताए।
उनकी जीवन संगिनी बिमल रणदिवे और बहन अहिल्या रंगनेकर—दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रों की प्रतिष्ठित जननेत्री—के साथ मिलकर उन्होंने क्रांतिकारियों के लिए उच्च व्यक्तिगत मानदंड स्थापित किए।
सीटू के 18वें अखिल भारतीय सम्मेलन की ओर बढ़ते हुए संगठन ने संकल्प व्यक्त किया है कि कॉमरेड बी.टी. रणदिवे की विरासत को सहेजा जाएगा, उनकी विपुल रचनाओं के माध्यम से नई पीढ़ी को शिक्षित किया जाएगा और उनके क्रांतिकारी आदर्शों को आगे बढ़ाया जाएगा।

