नई दिल्ली।
भारतीय मजदूर आंदोलन के अग्रणी नेता, स्वतंत्रता सेनानी और प्रख्यात मार्क्सवादी विचारक कॉमरेड पी. राममूर्ति की 38वीं पुण्यतिथि रविवार, 15 दिसंबर को देशभर में मनाई गई। इस अवसर पर विभिन्न श्रमिक संगठनों और वामपंथी दलों ने उनके योगदान को याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।
कॉमरेड पी. राममूर्ति ने अपने 79 वर्ष के जीवन में से लगभग 60 वर्ष श्रमिक वर्ग और सामाजिक न्याय के संघर्ष को समर्पित किए। धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक समानता और कम्युनिस्ट विचारधारा में उनकी गहरी आस्था उनके सार्वजनिक जीवन की पहचान रही। अपने राजनीतिक संघर्षों के दौरान उन्हें नौ वर्ष कारावास और पाँच वर्ष भूमिगत रहकर आंदोलन चलाना पड़ा।
वे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान असहयोग आंदोलन से जुड़े रहे। आज़ादी के बाद उन्होंने विधायक, सांसद और मार्क्सवादी सिद्धांतकार के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1964 में वाम आंदोलन के वैचारिक विभाजन के बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पोलित ब्यूरो के नौ संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे। वर्ष 1970 में उन्होंने सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) के संस्थापक महासचिव के रूप में संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा करने में अहम योगदान दिया।
संसदीय इतिहास में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। वर्ष 1979 में राज्यसभा में बीएचईएल-सीमेंस समझौते के विरोध में दिया गया उनका लंबा भाषण सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और स्वदेशी उद्योगों की रक्षा के पक्ष में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में दर्ज है। वे व्यापक भूमि सुधारों, शिक्षा में मातृभाषा के प्रयोग और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष के समर्थक रहे। छुआछूत के विरुद्ध उनके प्रयासों से मद्रास हाईकोर्ट में दलितों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला आया।
संगठनात्मक जीवन के साथ-साथ वे मानवीय संवेदनाओं के लिए भी जाने जाते थे। पार्टी और ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ताओं के साथ उनका निकट संपर्क रहा। अस्वस्थता के कारण सक्रिय जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद भी वे अंतिम समय तक मार्गदर्शन देते रहे। 15 दिसंबर 1987 को चेन्नई में उनका निधन हुआ।
उनकी पुण्यतिथि पर श्रमिक संगठनों ने उनके विचारों और संघर्षों को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया।

