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पहली बार एक ही काव्य-संग्रह में पिता-पुत्र का संगम: ‘काव्य कारवाँ’ में डॉ. आशीष कुमार गौतम और शांतिप्रिय ‘असुर’ की कविताएँ प्रकाशित

साहित्य-जगत में यह ऐतिहासिक अवसर तब सामने आया, जब पिता और पुत्र पहली बार एक ही पुस्तक ‘काव्य कारवाँ’ में कवि के रूप में एक साथ शामिल हुए हैं। इंक़लाब पब्लिकेशन के इस साझे काव्य-संग्रह में वरिष्ठ कवि डॉ. आशीष कुमार गौतम और उनके सुपुत्र मंजू आशीष बुद्धघोष, काव्य अथवा कलम नाम “शांतिप्रिय ‘असुर’” की कविताएँ सम्मिलित की गई हैं। यह न केवल एक परिवार की रचनात्मक परंपरा का साक्ष्य है, बल्कि दो पीढ़ियों के साहित्यिक संवाद का प्रतीक भी है।

उत्तर प्रदेश के जनपद बस्ती के ग्राम बस्थनवा (पोस्ट नेदुला, तहसील हरैया) निवासी प्रख्यात साहित्यकार डॉ. आशीष कुमार गौतम की कविता “बहन को ख़त” इस संग्रह की प्रमुख रचनाओं में से एक है। इस कविता में उन्होंने एक भाई के स्नेह, संवेदना और आशीर्वाद को आत्मीय शब्दों में व्यक्त किया है। यह रचना नारी-सम्मान, परिवार और जीवन-संस्कारों के मधुर भावों को अत्यंत सहजता से प्रस्तुत करती है, जिससे हर पाठक भाव-विभोर हो उठता है। पुत्र ने अपनी रचना “संस्कार” से अपना कदम काव्य जगत में रखा है, जो बताती हैं कि कैसे आप अपने परिवार, समाज, आज के परिवेश से जुड़ी हर छोटी बड़ी घटना से कैसे आपके विचार और व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

डॉ. गौतम के साहित्यिक योगदान को पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक मान्यता मिल चुकी है। समाज, शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में दिए गए उनके योगदान के लिए उन्हें अब तक 52 से अधिक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति, मानवता और सामाजिक चेतना की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है।

इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उनके सुपुत्र शांतिप्रिय ‘असुर’ (इंजीनियर मञ्जु आशीष बुद्धघोष) ने इस पुस्तक में अपनी काव्यात्मक अभिव्यक्ति से नवीन दृष्टि प्रदान की है। पेशे से सॉफ्टवेयर डेवलपर होने के बावजूद उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। बुद्धघोष (शांतिप्रिय ‘असुर’) का लेखन सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और यथार्थ से गहरे संवाद का माध्यम है। इससे पूर्व उनकी चर्चित पुस्तक “सारथी: इंसानियत ज़िंदा है?” तथा उसका अंग्रेज़ी संस्करण “The Charioteer: Humanity Alive?” पाठकों के बीच सराहे जा चुके हैं।

पिता-पुत्र की इस साझा प्रस्तुति ने यह सिद्ध किया है कि सृजन जब पारिवारिक संस्कारों और संवेदना से जुड़ता है, तब वह केवल कविता नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद बन जाता है।

‘काव्य कारवाँ’ इस साझे सृजन की यात्रा का प्रतीक है — जहाँ डॉ. गौतम की अनुभूति शांतिप्रिय ‘असुर’ की नवीन दृष्टि से मिलकर साहित्य को एक नई दिशा देती है।

Rishik Dwivedi
Rishik Dwivedi
Founder Member & Sub- Editor of NTF
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