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विद्यालयों का समायोजन बना मिड-डे मील रसोइयों के भविष्य पर संकट, प्रधान प्रतिनिधि अखिल यादव उठाई रसोइयों के समर्थन में आवाज

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में परिषदीय विद्यालयों का पुनर्गठन अब नीति का हिस्सा बन चुका है। सरकार का तर्क है कि जिन स्कूलों में 50 से कम छात्र हैं, उन्हें समीपवर्ती बड़े विद्यालयों में समायोजित किया जाएगा। उद्देश्य बताया जा रहा है — संसाधनों का समेकन, गुणवत्ता में सुधार और शिक्षा व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाना। इस नीति के अनुसार शिक्षक दूसरी जगहों पर तैनात हो जाएंगे, बच्चों को नया स्कूल मिल जाएगा, कागज़ी आंकड़े बेहतर दिखेंगे। लेकिन सवाल यह है कि इस ‘व्यवस्थागत सुधार’ की इस दौड़ में हम किन्हें पीछे छोड़ रहे हैं? स्कूल व्यवस्था की सबसे अनदेखी मगर सबसे ज़रूरी कड़ी है — मिड-डे मील की रसोइया। वह महिला जो हर सुबह सबसे पहले स्कूल का दरवाज़ा खोलती है, साफ़–सफाई करती है, समय पर चूल्हा जलाती है, सीमित संसाधनों में पोषणकारी भोजन तैयार करती है और यह सुनिश्चित करती है कि कोई बच्चा खाली पेट न लौटे। इन रसोइयों को आज तक स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला। वे न्यूनतम मानदेय पर कार्य करती हैं, किसी भी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा या सेवा-काल लाभ के बिना। अब जब स्कूल बंद हो रहे हैं, तो वे ‘व्यवस्था के बाहर’ कर दी जा रही हैं — बिना संवाद, बिना विकल्प। मिड-डे मील योजना का मूल्यांकन केवल पोषण या उपस्थिति के आँकड़ों से नहीं किया जा सकता। यह योजना बच्चों के पोषण, विद्यालय से जुड़ाव, विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा में निरंतरता लाने में महत्वपूर्ण रही है।
और इसकी सफलता की रीढ़ — ये रसोइयां — अब नीति निर्धारकों की चर्चा से बाहर हैं। क्या हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि जिन्होंने वर्षों तक बच्चों का भविष्य संवारने में अपनी भूमिका निभाई, आज उनके भविष्य को ही अनिश्चित छोड़ दें? विद्यालयों के एकीकरण की प्रक्रिया में यह आवश्यक है कि रसोइयों के पुनः नियोजन की ठोस नीति बने। उन्हें समीपवर्ती विद्यालयों में स्थानांतरित किया जाए। सेवा अवधि को मान्यता दी जाए। ।उन्हें न्यूनतम वेतन मान (Minimum Wages Act) के अनुरूप पारिश्रमिक मिले। भविष्य निधि, बीमा या पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में जोड़ा जाए। साथ ही, नीति निर्माण में केवल आर्थिक और प्रशासनिक तर्क नहीं, सामाजिक न्याय और लैंगिक संवेदनशीलता को भी प्रमुखता दी जानी चाहिए। क्योंकि विकास की कोई भी परिभाषा तब तक अधूरी है, जब तक उसमें समाज के सबसे निर्बल वर्ग की गरिमा की रक्षा न हो। रसोइयों की अनदेखी सिर्फ़ एक वर्ग को नज़रअंदाज़ करना नहीं, यह शिक्षा व्यवस्था के भीतर मौजूद असमानता की गवाही है। हम अक्सर शिक्षा के अधिकार की बात करते हैं, लेकिन क्या श्रम के सम्मान को भी उस अधिकार से जोड़ना ज़रूरी नहीं है?

अंत में, जब अगली बार हम मिड-डे मील के आँकड़े पढ़ें, तो सिर्फ़ थालियों की संख्या न गिनें — उन हाथों को भी याद रखें जो हर दिन बच्चों के लिए वो थाली सजाते रहे।
रसोइयों की आवाज़ को नज़रअंदाज़ करना, हमारी नैतिक चुप्पी होगी। और यह चुप्पी, इतिहास में दर्ज होगी — एक चूक के रूप में।

Rishik Dwivedi
Rishik Dwivedi
Founder Member & Sub- Editor of NTF
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