बस्ती: कठार जंगल की गोशाला में पशु सेवा के नाम पर मची लापरवाही की हकीकत दिल दहला देने वाली है। महज एक महीने में यहां 10 गोवंशीय पशुओं की मौत हो चुकी है, और कई बीमार पशु अब मौत के मुंह में जाने को मजबूर हैं। इन लाचार पशुओं की हालत देखकर किसी का भी दिल पसीज जाए, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी और प्रबंधन बेपरवाह बने हुए हैं।
ठंड में कफन बन रहे हैं खुले आसमान तले आश्रय
कठार जंगल ग्राम पंचायत की इस गोशाला में 95 गोवंशीय पशु रखे गए हैं, लेकिन इनके लिए न तो ठंड से बचाव के काउ कोट उपलब्ध हैं और न ही साफ-सफाई का कोई इंतजाम। बीमार पशु गंदगी के ढेर में पड़े तड़प रहे हैं, और स्थिति इतनी भयावह है कि कुछ पर कौवे तक झपट रहे हैं। दो गंभीर रूप से बीमार पशुओं की हालत ऐसी है कि उनका बचना मुश्किल लग रहा है।

सफाई के नाम पर खानापूर्ति, पशु मजबूर
गोशाला के चारों ओर गंदगी का आलम है। जगह-जगह गोबर और कीचड़ का अंबार है, जिसमें पशु बैठने को मजबूर हैं। साफ-सफाई की कमी और प्रबंधन की लापरवाही ने इस गोशाला को पशुओं के लिए कब्रगाह में बदल दिया है। ठंड के इस मौसम में भी अधिकांश पशु खुले में पड़े हैं, जिससे उनकी हालत और खराब हो रही है।
प्रबंधन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
गोशाला की बदहाल स्थिति पर अध्यक्ष चंद्रशेखर मिश्रा से संपर्क होने पर उनका पक्ष प्रकाशित किया जाएगा। उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस गोशाला में जानवरों की देखभाल का जिम्मा केवल कागजों तक सीमित है?
जिम्मेदार कौन?
स्थानीय प्रशासन और गोशाला प्रबंधन की लापरवाही ने इन बेजुबानों की जिंदगी को मौत के करीब ला दिया है। यह मामला न केवल पशु अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता का भी गंभीर उदाहरण है।
क्या यह खबर जिम्मेदारों को जगा पाएगी, या गोवंशीय पशु यूं ही मरने को मजबूर रहेंगे?

