दिल्ली के एम्स अस्पताल में मंगलवार रात बिहार की सुप्रसिद्ध लोक गायिका शारदा सिन्हा का निधन हो गया। 72 वर्षीय शारदा पिछले महीने से एम्स के आईसीयू में भर्ती थीं, जहां मल्टीपल मायलोमा नामक कैंसर के कारण उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी। डॉक्टरों की रिपोर्ट के मुताबिक, सेप्टीसीमिया और ‘रिफ्रैक्टरी शॉक’ ने उनकी स्थिति को और भी गंभीर बना दिया, जिससे रात करीब साढ़े नौ बजे उनकी मृत्यु हो गई। उनके निधन से संगीत जगत में गहरी शोक की लहर फैल गई है।
क्या है मल्टीपल मायलोमा? इस जानलेवा कैंसर के गंभीर प्रभाव
शारदा सिन्हा जिस बीमारी से जूझ रहीं थीं, उसे मल्टीपल मायलोमा कहा जाता है। यह एक प्रकार का रक्त कैंसर है, जो अस्थि मज्जा में प्लाज्मा कोशिकाओं को प्रभावित करता है। इन कोशिकाओं का मुख्य कार्य एंटीबॉडी बनाना होता है, जो हमारे शरीर को रोगों से बचाने में मदद करती हैं। लेकिन, मल्टीपल मायलोमा से पीड़ित होने पर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है, और रोगी संक्रमण की चपेट में आसानी से आ जाता है।
बढ़ती उम्र के साथ इस बीमारी का खतरा भी बढ़ता है। कैंसरग्रस्त प्लाज्मा कोशिकाएं हड्डियों में नुकसान पहुंचाकर उन्हें कमजोर बनाती हैं, जिससे मरीजों में हड्डियों के फ्रैक्चर और लगातार दर्द की समस्या होती है।

मल्टीपल मायलोमा के लक्षण: अनदेखी से बढ़ सकती है समस्या
रिपोर्ट के अनुसार, मल्टीपल मायलोमा के रोगियों में प्रारंभिक लक्षण जैसे असामान्य थकान, वजन में गिरावट, हड्डियों में दर्द, खून की कमी और भूख में कमी देखी जा सकती है। अक्सर इस बीमारी के कारण मरीजों की किडनी पर भी बुरा असर पड़ता है। पीठ, पसलियों और कूल्हों में लगातार दर्द एक सामान्य लक्षण है, जिसे अक्सर मोच या पीठ दर्द की समस्या समझा जाता है। मगर, यह लक्षण मायलोमा से संबंधित हो सकते हैं और समय पर इसका निदान महत्वपूर्ण होता है।
मल्टीपल मायलोमा का उपचार: कीमोथेरेपी से लेकर दर्द निवारण तक
इस बीमारी का इलाज बहुत ही गंभीरता से किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, प्राथमिक उपचार में कैंसरग्रस्त प्लाज्मा कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए गैर-कीमोथेरेपी दवाएं भी दी जाती हैं। दर्द को कम करने के लिए पैरासिटामोल या ट्रामाडोल जैसी दवाएं दी जाती हैं, लेकिन गंभीर दर्द होने पर मॉर्फिन और फेंटेनाइल जैसी दवाओं का भी उपयोग किया जाता है। इबुप्रोफेन और डाइक्लोफेनाक जैसी दर्द निवारक दवाएं, किडनी को नुकसान पहुंचाने के कारण इस स्थिति में नहीं दी जातीं।
हड्डियों को मजबूत करने और फ्रैक्चर को रोकने के उपाय
विशेषज्ञों का कहना है कि हड्डियों की मजबूती के लिए बिसफास्फोनेट्स या डेनोसुमाब जैसी दवाओं का सहारा लिया जाता है, जो हड्डियों के नुकसान को कम करती हैं और उन्हें मजबूत बनाती हैं। एक साल तक इन दवाओं को मासिक रूप से देने से फ्रैक्चर का जोखिम भी घटता है। इसके अलावा, रेडिएशन थेरेपी भी मल्टीपल मायलोमा के ट्यूमर को कम करने में सहायक होती है। गंभीर मामलों में कमजोर हड्डियों के लिए सर्जरी का सहारा भी लिया जा सकता है।
शारदा सिन्हा के निधन से लोक संगीत प्रेमियों के दिलों में गहरा शोक है। उनके निधन के साथ ही एक अद्वितीय संगीत यात्रा थम गई है।

