बस्ती: राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर कटाक्ष करती एक ग़ज़ल इन दिनों बस्ती के आम नागरिकों से लेकर सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। स्थानीय कवि मनीष शर्मा द्वारा लिखी इस ग़ज़ल ने बस्ती के हालातों को बखूबी बयान किया है, जिसमें जनता के मुद्दे, सड़कों की बदहाली, मोहब्बत की कद्र और राजनीति की चालों पर करारा व्यंग्य किया गया है।
ग़ज़ल की पहली पंक्ति, “चलो आओ दिखाता हूं सरे बाज़ार बस्ती में…” से ही कवि ने शहर के हालातों पर एक व्यंग्यात्मक नजरिया पेश किया है। ग़ज़ल के माध्यम से यह इशारा किया गया है कि बस्ती में दिखावे और दरबारी चापलूसी का बोलबाला है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
ग़ज़ल
चलो आओ दिखाता हूं सरे बाज़ार बस्ती में…
कि होता कुछ नहीं लगता है बस दरबार बस्ती में …
विधायक जी ने कल मुजरा किया छापा गया है ये …
नहीं है उनके जैसा कोई दावेदार बस्ती में …
न पूछो हाल सड़कों का न पूछो हाल गांवों का…
न पूछो किस क़दर गड्ढों का है अंबार बस्ती में …
लगाओ आग मत प्यारे मोहब्बत की ये मिट्टी है…
यहां तलवार पे भारी है सबका प्यार बस्ती में…
न कोई पूछने वाला न कोई टोकने वाला…
उठाकर सर जो फिरते हैं यहां गद्दार बस्ती में …
विधायक जी विधायक जी विधायक जी विधायक जी …
भरे है झूठ से सारे यहां अखबार बस्ती में…
~मनीष शर्मा
मनीष शर्मा की यह ग़ज़ल बस्ती की जमीनी हकीकत और राजनीतिक सर्कस को न केवल उभारती है, बल्कि समाज के हर तबके में एक सोचने की लहर भी पैदा करती है। जहां एक ओर जनता के दिलों में ग़ज़ल ने जगह बना ली है, वहीं दूसरी ओर इसने नेताओं और स्थानीय प्रशासन को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
यह ग़ज़ल एक सशक्त माध्यम बनकर सामने आई है, जो न केवल बस्ती के लोगों की आवाज़ को उठाती है, बल्कि सियासी तंत्र पर भी तीखा व्यंग्य करती है।

