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बस्ती में बाढ़ का कहर: घाघरा और कुआनों नदियों के उफान से गांवों में कटान, पलायन जारी

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में लगातार हो रही बारिश ने जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। घाघरा और कुआनों नदियों का जलस्तर लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे नदी किनारे बसे गांवों में कटान की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। अब तक कई गांवों के खेत, मकान और जमीनें नदी में समा चुकी हैं,

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में लगातार हो रही बारिश ने जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। घाघरा और कुआनों नदियों का जलस्तर लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे नदी किनारे बसे गांवों में कटान की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। अब तक कई गांवों के खेत, मकान और जमीनें नदी में समा चुकी हैं, जिससे लोगों के समक्ष जीवन यापन का संकट खड़ा हो गया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि लोग अपने घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर हैं।

कटान से प्रभावित गांवों की स्थिति

बुधवार को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बस्ती जिले के कई गांव बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं। खासकर कलवारी रामपुर तटबंध के बीच स्थित गांव मईपुर, बड़कापुरवा, मदरहवा और महुआपार खुर्द बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इन गांवों के पास नदी का प्रवाह एक लूप बना चुका है, जिसके चलते गांवों में तीव्र कटान हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि नदी के इस लूप के कारण भूमि कटान लगातार तेज हो रही है, जिससे उनके घर और खेत नदी की चपेट में आ रहे हैं।

ग्रामीणों का पलायन

हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि प्रभावित गांवों के लोग अब अपने घरों को खुद ही तोड़ने के लिए मजबूर हो गए हैं। जहां एक ओर कुछ लोग ईंटें और अन्य निर्माण सामग्री बचाने के लिए अपने मकानों को बुलडोजर से गिरा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ ग्रामीण अपने पक्के मकानों को पूरी तरह से छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं।

इस त्रासदी के बीच कई लोग किराए पर मकान लेकर, तो कई लोग तटबंधों पर अस्थायी रूप से शरण ले रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अब उनके पास कुछ भी बचाने का कोई विकल्प नहीं है। उन्हें यह महसूस हो रहा है कि बाढ़ की यह विभीषिका उनकी मेहनत और सालों की संपत्ति को बर्बाद कर देगी। कई परिवारों ने अपने छोटे बच्चों और बुजुर्गों को पहले ही सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया है।

प्रशासन की सक्रियता

प्रभावित इलाकों में प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है। बाढ़ से बचाव के लिए युद्ध स्तर पर कार्य किए जा रहे हैं और सतत निगरानी रखी जा रही है। प्रशासनिक अधिकारी लगातार प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं और बाढ़ नियंत्रण की स्थिति का जायजा ले रहे हैं। अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि वे सुरक्षित स्थानों पर चले जाएं और किसी भी तरह की अप्रिय घटना से बचने के लिए सतर्क रहें।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन क्षेत्रों में अब तक सैकड़ों हेक्टेयर जमीन बाढ़ की चपेट में आ चुकी है और स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। अधिकारियों ने कहा है कि अगर जलस्तर इसी तरह बढ़ता रहा, तो और भी गांवों पर खतरा मंडरा सकता है। बाढ़ बचाव कार्यों के तहत स्थानीय प्रशासन ने कई अस्थायी राहत शिविर बनाए हैं, जहाँ पलायन करने वाले लोगों को ठहराया जा रहा है। साथ ही, बाढ़ प्रभावितों के लिए आवश्यक खाद्य सामग्री और दवाइयाँ भी उपलब्ध कराई जा रही हैं।

ग्रामीणों की मुश्किलें

हालांकि, प्रशासन की ओर से किए जा रहे राहत कार्यों के बावजूद ग्रामीणों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। खेतों और घरों के नुकसान से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। जिन ग्रामीणों के पास पक्के मकान थे, वे अब उन मकानों को तोड़ने पर मजबूर हैं, ताकि किसी तरह ईंटों को सुरक्षित रख सकें और बाढ़ के बाद वे अपने घरों का पुनर्निर्माण कर सकें।

कई ग्रामीणों ने यह भी शिकायत की है कि राहत कार्यों में देरी हो रही है, और सरकार की ओर से पूरी मदद नहीं मिल पा रही है। प्रशासन ने हालांकि स्थिति पर काबू पाने के लिए हरसंभव प्रयास जारी रखने का आश्वासन दिया है, लेकिन प्राकृतिक आपदा के आगे इंसानी प्रयास अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं।

बाढ़ के आगे बेबस लोग

बस्ती में बाढ़ की इस विभीषिका ने ग्रामीणों के जीवन को तबाह कर दिया है। कुछ ही दिनों में जलस्तर इतना बढ़ गया है कि अब लोग अपने घर-बार को छोड़कर खुले आसमान के नीचे रहने के लिए मजबूर हैं। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के लिए यह समय बेहद कठिन है, लेकिन इस आपदा में फंसे लोगों के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

अब यह देखना होगा कि प्रशासन और सरकार की ओर से कब और कैसे इस समस्या का स्थायी समाधान निकलता है, ताकि बस्ती के लोगों को इस तरह की त्रासदियों से जूझना न पड़े।

Rishik Dwivedi
Rishik Dwivedi
Founder Member & Sub- Editor of NTF
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