25 जून, 1975 की तारीख भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा की थी। इस घोषणा से पूरा देश सन्न रह गया था। लोग असमंजस में थे कि अब आगे क्या होने वाला है। इमरजेंसी के तुरंत बाद विपक्षी नेताओं को चुन-चुनकर गिरफ्तार किया गया और उन्हें जेल में डाल दिया गया।
रेडियो पर की गई थी इमरजेंसी की घोषणा
49 साल पहले इंदिरा गांधी ने रेडियो के माध्यम से इमरजेंसी की घोषणा की थी। 26 जून, 1975 की सुबह उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो पर देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा, “राष्ट्रपति ने देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी है। इसमें घबराने की कोई बात नहीं है…” यह सुनकर देशभर के लोग सन्न रह गए थे। आम लोगों को यह अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ घंटों, दिनों, महीनों और सालों में क्या होने वाला है।
इमरजेंसी के दौरान का माहौल
आपातकाल लागू होने के बाद देश में व्यापक बदलाव देखने को मिले। विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी और मोरारजी देसाई जैसे प्रमुख नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इन 21 महीनों में, जो कुछ हुआ, वह आज भी विवादास्पद माना जाता है। कांग्रेस सरकार को इसके लिए समय-समय पर आलोचना झेलनी पड़ती है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
इमरजेंसी की घोषणा के कुछ समय बाद सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर सशर्त रोक लगा दी, जिसमें इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव को अमान्य घोषित किया गया था। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी को संसदीय कार्यवाही से दूर रहने का आदेश दिया था।
आयरन लेडी के निर्णय पर सवाल
1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने शानदार जीत दर्ज की थी। दिसंबर 1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजादी दिलाने के बाद इंदिरा गांधी को आयरन लेडी के रूप में पहचाना गया था। लेकिन कुछ सालों बाद ही इमरजेंसी की घोषणा ने उनके कामों पर सवाल खड़े कर दिए थे।
इमरजेंसी लगाने के कारण
1975 में देश अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन, बिहार में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन और 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेलवे हड़ताल ने सरकार को हिला कर रख दिया था। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया। गुजरात चुनावों में कांग्रेस की हार और 26 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली ने इंदिरा गांधी की सरकार को संकट में डाल दिया। इन्हीं सब कारणों से इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगानी पड़ी।
21 महीने का आपातकाल
इमरजेंसी के 21 महीने भारतीय लोकतंत्र के लिए काले अध्याय के रूप में याद किए जाते हैं। विपक्षी दल आज भी इसे काला धब्बा मानते हैं और कांग्रेस पर हमलावर होते रहते हैं। इमरजेंसी के दौरान स्वतंत्रता पर कई प्रकार के अंकुश लगाए गए, जिसने देश की राजनीति और समाज पर गहरा प्रभाव डाला।
इन घटनाओं ने भारतीय राजनीति को गहरे रूप से प्रभावित किया और आज भी इमरजेंसी की चर्चा राजनीति के गलियारों में होती रहती है।

